वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्टैंड अप कॉमेडी इस परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति का नया रूप लेकर उभरी है। डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित हास्य आधारित कंटेंट युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रहा है। परन्तु, हाल के वर्षों में इस माध्यम की प्रस्तुति तथा विषयवस्तु के स्तर में गिरावट देखी गई है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषंगी संगठन संस्कार भारती की पत्रकार वार्ता में भिनेता और रंगकर्मी राजीव वर्मा कही।
शॉर्टकट प्रसिद्धि' की होड़
उन्होने कहा कि यह माध्यम जहां एक ओर सशक्त सामाजिक सुधारों का उपकरण बन सकता है, वहीं दूसरी ओर यह तेजी से 'शॉर्टकट प्रसिद्धि' की होड़ में अशोभनीय भाषा, धर्म, जाति, लैंगिक असंवेदनशीलता और राष्ट्रीय मूल्यों की अवमानना का मंच बनता जा रहा है। संस्कार भारती से जुड़े हुए कलासाधक तथा कार्यकर्ताओं से यह आह्वान किया है कि वे देशभर सक्रिय, संवेदनशील एवं प्रेरणास्पद भूमिका का निर्वहन करें, जिससे हास्य विधा भारतीय मूल्यों, गरिमा और सांस्कृतिक उद्देश्य के अनुरूप विकसित हो सके। पत्रकार वार्ता में मध्य भारत प्रांत के प्रचार प्रमुख डॉ संदीप श्रीवास्तव और सह महामंत्री कृष्ण गोपाल पाठक के साथ जिला महामंत्री नीरव प्रधान भी मौजूद रहे।
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धार्मिक प्रतीकों का कर रहे उपहास
राजीव वर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता की आड़ में कई कलाकार जानबूझकर या अनजाने में धार्मिक प्रतीकों का उपहास, राष्ट्रनायकों की व्यंग्यात्मक आलोचना या सामाजिक प्रथाओं का मजाक उड़ाते हुए, लोकप्रियता पाने का प्रयास करते हैं। ऐसे अनेक कॉमिक सेगमेंट देखे गए हैं जहां केवल गालियों, यौन संकेतों या सांप्रदायिक टिप्पणियों के सहारे हंसी बटोरने का प्रयास किया जाता है। यह प्रवृत्ति युवा दर्शकों में संवेदनशीलता, सहिष्णुता और सांस्कृतिक सम्मान की भावना को भी क्षीण करती है। संस्कार भारती की प्रबंधकारिणी वर्तमान समय में स्टैंड अप कॉमेडी जैसे विभिन्न हास्य कला प्रस्तुतियों के गिरते हुए स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त करती है।
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नाट्यपरंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम परंपरा
राजीव वर्मा ने कहा कि भारत की नाट्यपरंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम परंपरा है, जिसकी आधारशिला भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में रखी गई है। इसमें वर्णित रस-भाव सिद्धांत भारतीय नाट्य परंपरा की आत्मा है, जो केवल मनोरंजन नहीं, अपितु 'लोकशिक्षा' और 'चित्तविनोद' का साधन है। हास्य रस को नौ रसों में भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है दिया गया है। यह परंपरा सामाजिक चेतना, मानवीय व्यवहार, संस्कार एवं संस्कृति का संवाहक रही है। चाहे वह संस्कृत नाटकों का सौम्य हास्य हो. संतों एवं कवियों के दोहे हों. थेरी कूट्ट. तमाशा, जात्रा, स्वांग भांड, नौटंकी आदि लोक परंपराओं की व्यंग्यपूर्ण कहानियाँ हों या समकालीन साहित्य की व्यंग्यात्मक शैली, सभी में हास्य ने जनमानस को आत्मचिंतन, संवाद और सुधार की दिशा में प्रेरित किया है।