प्रदेश सरकार द्वारा संचालित पोषण आहार योजना में कांग्रेस ने 110 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। पार्टी ने कहा कि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते, कई बच्चो की मौत हो गई, उनके नाम का राशन भी सरकार द्वारा निकाला जा रहा है। क्या 100 फीसदी बच्चों रोज स्कूल आते हैं? मध्यान्ह भोजन शुरूआते में आकर्षण का केंद्र था, लेकिन धीरे-धीरे यह योजना बच्चों के लिए कोई बड़ा आकर्षण नहीं रहीं, ऐसी स्थिति में 40 प्रतिशत बच्चों स्कूलों में नहीं आते, इतनी लचर, अव्यवस्थित और गुणवत्ताहीन होने के बाद भी 201 करोड़ का पुरस्कार भी सरकार ने ले लिया और गलत तरीके से पुरस्कार का उल्लेख भी सीएजी की रिपोर्ट में किया गया है।
प्रदेश कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने मंगलवार को पीसीसी में प्रेसवार्ता में ये आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में पोषण आहार में हुए भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा खुलासा किया है। इसमें परिवहन विभाग भी संलिप्त है। पोषण आहार सप्लाई में परिवहन करने वाले वाहनों में स्कूटर, मोटर साईकिल का उपयोग किया गया है, जिससे एक साथ सैकड़ों क्विंटल माल सप्लाई का हवाला दिया गया है। सरकार ने पोषण आहार सप्लाई में 110 करोड़ का घोटाला कर भ्रष्टाचार का बड़ा कारनामा किया है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार मप्र में 428 करोड़ की मध्यान्ह भोजन योजना में घोटाला सामने आया है।
सीएजी रिपोर्ट में खुलासा
उन्होंने कहा कि मध्यान्ह भोजन के तहत प्रदेश में 88,119 केंद्र हैं। इनमें 1 करोड़ 9 लाख बच्चे रजिस्टर्ड हैं। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि मध्यान्ह भोजन योजना के तहत वर्ष 2024-25 के लिए इन बच्चों को 2190 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी, जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। वहीं, प्रदेश में 453 बाल विकास परियोजनाओं के अंतर्गत 84465 आंगनवाड़ी केंद्र और 12670 मिनी आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिसमें 80 लाख हितग्राही बच्चों को पोषण आहार देने की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है, योजना में 50 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है। यानि 12 रुपये प्रति बच्चे मप्र सरकार द्वारा दिया जाता है, जिसे बढ़ाकर 18 रुपये का प्रस्ताव सरकार ने दिया है।
सरकार में बैठे लोग अपने ही बच्चों का अनाज खा रहे
नायक ने कहा कि मध्य प्रदेश में एमडीएम योजना 1995 से लागू की गई, योजना के तहत प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों को 100 ग्राम, मिडिल स्कूल के बच्चों को 150 ग्राम, गेहूं अथवा चावल दिया जाता है। वहीं, प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए 100 ग्राम प्रति बच्चा प्रति दिवस की दर से और उच्च प्राथमिक कक्षाओं को 150 ग्राम प्रति बच्चा प्रतिदिन की दर से भारतीय खाद्य निगम के निकटस्थ गोदाम से निःशुल्क खाद्यान्न की आपूर्ति की जाती है। नायक ने कहा कि मनुष्य में दया, करूणा, मानवता, उदारता होती है, लेकिन सरकार में बैठे लोग अपने ही बच्चों का अनाज खा रहे हैं, और अपने ही बच्चों को खा जाने का स्वभाव जानवरों में होता है। जिस राज्य का 50 प्रतिशत अनाज सरकार खा जाए तो यह पशुओं से ज्यादा भयावह लोग सरकार में बैठे हैं।
कुपोषण के मामले में मप्र नंबर एक पर
नायक ने कहा कि कुपोषण के मामले में भारत दुनिया में नंबर एक पर है, वहीं देश में मप्र कुपोषण के मामले में नंबर एक पर है। गलत आंकड़े देकर पोषण आहार के नाम पर पुरस्कार लिया गया है। वहींं, 2000 करोड़ का फंड पोषण आहार के लिए सरकार द्वारा जारी किया गया, जो भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ गया। इन 20 सालों में जिन बच्चों की मृत्यु हो गई वे योजना में रजिस्टर्ड हैं, योजना को संचालित करने वाले जो व्यवस्थापक हैं, वे ही बच्चों के पोषण आहार की राशि डकार गए।
दोपहिया के निकले वाहनों के नंबर
नायक ने कहा कि योजना में हुए भ्रष्टाचार में महत्वपूर्ण कड़ी परिवहन विभाग भी है। सीएजी की रिपोर्ट में पोषण आहार वितरण के लिए उपयोग किए गए वाहनों के जो नंबर दिए गए हैं, उसमें मोटर साईकिल, स्कूटर के नंबर हैं। इनसे 500-500 क्विंटल अनाज का परिवहन किया गया है। इसका पता लगाया गया तो बताया गया कि ये वाहन कंडम हो गए और वर्कशॉप में पड़े हैं।