आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कर रहे निजी अस्पतालों का भुगतान अटकने और अस्पतालों में एनएबीएच की अनिवार्यता के विरोध में बुधवार को निजी अस्पताल संचालक और डॉक्टर सड़क पर उतर आए। यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनर तले डॉक्टर और अस्पताल कर्मचारी जेपी अस्पताल परिसर स्थित आयुष्मान योजना के कार्यालय पहुंचे और प्रदर्शन किया। अस्पताल संचालकों ने पुराना बकाया भुगतान तत्काल जारी करने और एनएबीएच की अनिवार्यता हटाने की मांग की। अस्पताल संचालकों का कहना है कि कई अस्पतालों को पिछले पांच से छह महीने से नियमित भुगतान नहीं मिला है। कुछ अस्पतालों में इससे भी पुरानी राशि अटकी हुई है। भुगतान नहीं होने से दवा विक्रेताओं, कर्मचारियों और अन्य सेवा प्रदाताओं का भुगतान करना मुश्किल हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो प्रदेश स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
45 दिन में भुगतान का समझौता, फिर भी बढ़ रही पेंडेंसी
एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा ने कहा कि आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों का करोड़ों रुपये का भुगतान लंबित है। उनका कहना है कि कई अस्पतालों पर औसतन डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक की राशि बकाया है। भुगतान नहीं मिलने से अस्पताल संचालकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। डॉ. अंजन पाराशर ने कहा कि अस्पतालों और योजना के बीच हुए समझौते के अनुसार केस का भुगतान 45 दिन में होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में भुगतान लगातार टुकड़ों में मिल रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जनवरी में 100 रुपये का काम होने पर 20 रुपये और फरवरी में 100 रुपये के काम पर 20 रुपये का भुगतान किया गया। इससे लंबित राशि लगातार बढ़ रही है। उनके अनुसार कई अस्पताल संचालकों ने कर्ज लेकर अस्पताल खड़े किए हैं। भुगतान अटकने से ऋण की किस्त, कर्मचारियों का वेतन और दवा-दुकानदारों का भुगतान तक प्रभावित हो रहा है।
एनएबीएच की अनिवार्यता पर भी विरोध
निजी अस्पताल संचालकों ने आयुष्मान योजना में एनएबीएच (नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स) की अनिवार्यता का भी विरोध किया। उनका कहना है कि गुणवत्ता मानकों का विरोध नहीं है, लेकिन छोटे और मध्यम अस्पतालों पर एनएबीएच की अनिवार्यता व्यावहारिक नहीं है। डॉ. अंजन पाराशर ने दावा किया कि एनएबीएच प्रक्रिया में अस्पतालों को 25 से 30 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। उनका कहना है कि जब पुराने भुगतान ही लंबित हैं, ऐसे समय में अस्पतालों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना मुश्किल है। अस्पताल संचालकों के अनुसार एनएबीएच की शर्त पूरी नहीं कर पाने वाले छोटे और मध्यम अस्पतालों के आयुष्मान योजना से बाहर होने की आशंका है। इससे उन मरीजों पर असर पड़ सकता है, जो घर के नजदीक निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत कैशलेस उपचार कराते हैं।
एक अक्टूबर से डी-एम्पैनलमेंट की आशंका
डॉ धनजय मिश्रा का कहना है कि उन्हें ऐसी जानकारी मिल रही है कि एक अक्टूबर से भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में बड़ी संख्या में अस्पतालों को आयुष्मान योजना से डी-एम्पैनल किए जाने की कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, इस संबंध में संबंधित अस्पतालों की अंतिम आधिकारिक सूची या आदेश अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। संचालकों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में अस्पताल योजना से बाहर होते हैं तो सरकारी और अन्य सूचीबद्ध अस्पतालों पर आयुष्मान मरीजों का अतिरिक्त भार बढ़ सकता है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि किसी भी बड़े स्तर की कार्रवाई से पहले अस्पताल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर व्यावहारिक समाधान निकाला जाए।
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भुगतान नहीं मिला तो इलाज बंद करने का कठोर फैसला
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे आयुष्मान योजना के तहत गरीब मरीजों का इलाज बंद नहीं करना चाहते, लेकिन लगातार भुगतान अटकने से अस्पताल चलाना मुश्किल हो रहा है। डॉ. पाराशर ने कहा कि यदि लंबित भुगतान नहीं किया गया तो अस्पताल संचालकों को आयुष्मान योजना के तहत इलाज बंद करने जैसा कठोर निर्णय लेने पर मजबूर होना पड़ सकता है। अस्पताल संगठनों ने सरकार से पुराना बकाया तत्काल जारी करने, आगे के भुगतान को तय समय सीमा में करने और एनएबीएच की अनिवार्यता पर पुनर्विचार करने की मांग की है।