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AIIMS Bhopal: रोशनी से एक्टिव नैनो तकनीक से खत्म होगा कैंसर, ब्रेस्ट-लिवर ट्यूमर तक खुद पहुंचकर करेगा इलाज

Sat, 11 Apr 2026 06:05 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल

सार

एम्स भोपाल के वैज्ञानिकों ने ऐसी नैनो तकनीक विकसित की है, जो शरीर में जाकर ट्यूमर तक पहुंचती है और लाल रोशनी मिलने पर ही कैंसर कोशिकाओं पर हमला करती है। यह तकनीक ब्रेस्ट और लिवर कैंसर में प्रभावी पाई गई है और कम साइड इफेक्ट के साथ सटीक इलाज की नई उम्मीद जगाती।
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एम्स भोपाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजधानी भोपाल में कैंसर उपचार को लेकर बड़ी सफलता सामने आई है। एम्स भोपाल के बायोकैमिस्ट्री विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. सुखेस मुखर्जी ने ऐसी नैनो तकनीक विकसित की है, जो शरीर के अंदर जाकर खुद ट्यूमर तक पहुंचती है और लाल रोशनी मिलते ही कैंसर कोशिकाओं पर हमला शुरू कर देती है। यह नैनोकण इंसानी बाल से हजारों गुना छोटे होते हैं और शरीर में बिना असर डाले ट्यूमर तक पहुंच जाते हैं। खास बात यह है कि ये तब तक निष्क्रिय रहते हैं, जब तक इन्हें सक्रिय करने का संकेत नहीं मिलता।
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लाल रोशनी से होता है डुअल अटैक
जैसे ही इन कणों पर लाल रोशनी डाली जाती है, ये सक्रिय होकर दो तरह के कैंसर-रोधी तत्व छोड़ते हैं सिंगलेट ऑक्सीजन और कार्बन मोनोऑक्साइड। दोनों मिलकर कैंसर कोशिकाओं को तेजी से नष्ट करते हैं, इसलिए इसे डुअल अटैक तकनीक कहा जा रहा है।

ब्रेस्ट और लिवर कैंसर में असरदार
शोध के दौरान यह तकनीक स्तन (ब्रेस्ट) और यकृत (लिवर) कैंसर कोशिकाओं पर प्रभावी पाई गई है। इससे उम्मीद है कि भविष्य में बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह तकनीक सिर्फ रोशनी पड़ने पर ही सक्रिय होती है और अंधेरे में सुरक्षित रहती है। इससे शरीर के स्वस्थ हिस्सों को नुकसान नहीं पहुंचता और साइड इफेक्ट कम होते हैं। डॉक्टर जरूरत के हिसाब से सही जगह और सही समय पर इसे एक्टिव कर सकते हैं।
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शरीर में खुद खत्म हो जाते हैं कण
इस नैनो तकनीक में इस्तेमाल कण लंबे समय तक रोशनी न मिलने पर शरीर में धीरे-धीरे टूटकर खत्म हो जाते हैं। साथ ही जरूरत के अनुसार इन्हें मॉडिफाई भी किया जा सकता है। इस तकनीक को वैश्विक मान्यता भी मिली है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल डॉल्टन ट्रांजैक्शंस में प्रकाशित हुआ है।

क्या होते हैं नैनोकण
नैनोकण बेहद सूक्ष्म कण होते हैं, जो इंसानी बाल से हजारों गुना छोटे होते हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि ये शरीर के अंदर किसी खास हिस्से तक पहुंचकर सटीक इलाज कर सकें।
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