बक्सवाहा जंगल की जमीन को हीरा खदान के लिए आवंटित किए जाने को चुनौती देने वाले मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से अपना जवाब पेश किया गया है। जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकार उन्हीं संपदा का संरक्षण करती है, जिन्हें नोटिफाइड किया गया है। बक्सवाहा में एएसआई ने वर्ष 1958 के कानून के तहत सर्वे किया है, जहां पुरातात्विक संपदा पाई गई है। अब इसे नोटिफाई करने के लिए पुरातात्विक आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया में सक्रियता से विचार हो रहा है। वर्तमान में उक्त क्षेत्र नोटिफाइड नहीं है और न ही राज्य सरकार की सूची में शामिल है।
गौरतलब है कि बक्सवाहा हीरा खदान के खिलाफ हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दायर की गई थीं। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे की ओर से दायर की गई याचिका में बक्सवाहा के जंगल में 25 हजार वर्ष पूर्व की अतिप्रचलित रॉक पेंटिंग को पुरातात्विक संपदा घोषित किए जाने मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि रॉक पेंटिंग की जानकारी दिए जाने के बावजूद भी पुरातत्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित नहीं किया गया है। इस क्षेत्र में 364 हैक्टेयर भूमि में प्रस्तावित डायमंड माईनिंग की कार्यवाही कभी भी शुरू हो सकती है। पेंटिंग पाषाण युग में मानव जीवन की जानकारी देने वाले स्त्रोत के लिए महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण तथा बक्सवाहा जंगल से जुड़े बिंदु पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की गई थी। पुरातात्विक संपदा का मामला एनजीटी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इस कारण हाईकोर्ट में उक्त याचिका दायर की गई है। वहीं हरियाणा फरीदाबाद निवासी रमित बासु, महाराष्ट्र पुणे निवासी हर्षवर्धन मेलांता व उप्र निवासी पंकज कुमार की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि हीरे की खदान के लिए आदित्य बिरला ग्रुप की एस्सल माइनिंग एंड इंड्रस्ट्री को छतरपुर स्थित बक्सवाहा के जंगल की 382 हैक्टेयर जमीन राज्य सरकार द्वारा 50 साल की लीज दी गई है। हीरा उत्खन्न के लिए रेन फॉरेस्ट के लगभग सवा दो लाख पेड़ों को काटा जाएगा। जबकि उक्त जंगल पन्ना टाइगर रिजर्व से लगा हुआ है, जो टाईगर कॉरिडोर में आता है। इसके लिए एनटीसीए व बाईल्ड लाइव बोर्ड से अनुमति भी नहीं ली गई। आवेदकों का कहना है कि वनजीवों को जीवन का अधिकार प्राप्त है और वो जंगल में रहते हैं। जब जंगल नष्ट हो जाएंगे तो वनप्राणी कहां रहेंगे। पृथ्वी में सभी को जीवन का अधिकार प्राप्त है। बक्सावाहा के जंगल में बड़ी संख्या में वन सम्पदा है और ऐसे जंगल पनपने में हजारों साल लगते हैं। राज्य सरकार ने लाभ के लिए जंगल की जमीन को लीज पर दिया है, जो गलत निर्णय है।
आर्कियॉलिजीकल विभाग ने हाईकोर्ट के निर्देश पर रॉक पेटिंग के संबंध में अपनी सर्वे रिपोर्ट पेश की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि बक्सवाह जंगल में स्थित रॉक पेंटिंग पाषाण युग के मध्यकाल की है। युगलपीठ ने रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद उत्खन्न पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए थे। मामले में अब एएसआई ने अपना जवाब न्यायालय के समक्ष पेश किया है, जिस पर आगामी सुनवाई पर न्यायालय अपना निर्देश जारी करेगी।