लखनऊ। कबीर महोत्सव के दूसरे दिन सजा मुशायरा अदब और अहसासों की रूहानी शाम लेकर आया। सबसे पहले गुलाब मुंतजिर ने दर्द और दोस्ती पर शेर पढ़ा- तू मेरे जख्मों पर अपने हाथ से तुरपाई कर...। पीयूष अग्निहोत्री ने जिंदगी की कड़वी हकीकत पर पढ़ा- चंद लम्हों में यह बरसात चली जाएगी…। वंदना वर्मा अनम की नज्म में बनारस और अवध की खुशबू घुली- मैं हूं सुबह बनारस, वो अवध की शाम-सा लड़का…। बलवंत सिंह ने रिश्तों और बदलते लोगों पर शायरी से चोट किया- हाथ जोड़े जो खड़े हैं सामने, काम हो जाने पर लहजा देखना…। आखिर में सलीम सिद्दीकी ने पढ़ा- हमारे गांव में सूखा कभी नहीं पड़ता, कि हम परिंदों को पानी पिलाते रहते हैं।
महोत्सव में पहुंचे लोग।
महोत्सव में पहुंचे लोग।
महोत्सव में पहुंचे लोग।
महोत्सव में पहुंचे लोग।
महोत्सव में पहुंचे लोग।