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आईआईएम में योगी के मंत्रियों की हुई परीक्षा, छात्र बनकर सीखे नेतृत्व के तरीके

Mon, 23 Sep 2019 02:16 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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आईआईएम में मौजूद मंत्री - फोटो : amar ujala
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गुफा और रेगिस्तान में भटकने के बाद आखिरकार मंत्रियों ने मनन-मंथन की मंजिल पार कर ली। बारी जब उनके नेतृत्व, निर्णय और सोच की क्षमता समझने की आई तो ये सभी आम छात्रों से दिखे।
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समूह में चर्चा करने के बाद अलग-अलग मुद्दे देकर समस्याओं के समाधान की क्षमता और नेतृत्व का कौशल परखने की रविवार को हुई परीक्षा में सभी एक-दूसरे से कान में बात करते नजर आए। गोया आम छात्र हों। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंथन में मौजूद महिला मंत्रियों और अधिकारियों से आगे आकर विचार रखने को कहा तो वे भी मुखर हो गईं।

पिछले रविवार को हुए मंथन में प्रदेश के विकास की वरीयता निर्धारित करते हुए अवस्थापना सुविधाओं, कानून-व्यवस्था, कृषि एवं ग्रामीण विकास, औद्योगिक विकास, सेवा, मानव संसाधन विकास और नगरीय विकास विषय तय किए गए थे।
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इस बार इन विषयों को 11 हिस्सों में बांटकर मंथन में शामिल मंत्रियों के 11 समूह बनाए गए। फिर अलग-अलग समूह को अलग-अलग मुद्दे सौंपकर संबंधित क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के तरीके तथा इनके जरिये प्रदेश के विकास की उनकी परिकल्पना के बारे में पूछकर उनकी क्षमता का आकलन हुआ। साथ ही दृष्टिकोण व दूरदृष्टि की परख की गई।

ये विषय दिए गए 

किसी समूह को चिकित्सा शिक्षा का विषय सौंपकर उनसे लोगों को तत्काल और बेहतर चिकित्सा के प्रबंधन को लेकर उपायों के बारे में उनकी वैचारिक शक्ति परखी गई तो किसी समूह को प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी का मुद्दा सौंपकर उसमें शामिल मंत्रियों का दृष्टिकोण व दृष्टि मापने का प्रयास हुआ।

किसी समूह को बताना था कि बेहतर सड़कों के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है तो किसी से यह समझने की कोशिश हुई कि शिक्षा के किस मॉडल से उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को 10 खरब डॉलर की करने में मदद मिल सकती है। बिजली, पानी, पर्यटन, कौशल विकास को लेकर भी मंत्रियों की सोच को समझने का प्रयास किया गया।

गड़बड़ियों को कैसे कम करें
मंत्रियों से विकास कार्यों के दौरान होने वाली गड़बड़ियों को कम करने के उपाय पूछकर उनकी निर्णय क्षमता और समझ का आकलन हआ। साथ ही उन्हें टिप्स भी दिए गए। बताया गया कि काम में गड़बड़ियां न हों, इसके लिए कम लागत में बेहतर काम करने की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है। सरकारी और निजी एजेंसियों के बीच भी मुकाबला बढ़ाकर काम की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है।
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समझाए गए तरीके

दार्शनिकों और महापुरुषों के जरिये यह समझाने की कोशिश हुई कि सार्वजनिक जीवन में सच्चरित्रता, ईमानदारी और व्यवहारकुशलता क्यों जरूरी है। अरस्तू का उल्लेख करते हुए समझाया गया कि हम अच्छे व्यक्ति को दूसरों की तुलना में जल्दी मानते हैं। चरित्र संसार का सबसे प्रेरक साधन है। किसी व्यक्ति का निर्णय उसकी भावनाओं से ही प्रभावित होता है।

प्रसन्न और मिलनसार स्वभाव वाले अन्य लोगों को समस्याओं के समाधान में ज्यादा सहायक होते हैं। आलोचनाओं पर अक्सर नाराज हो जाने वालों की नसीहत देते हुए बताया गया कि आलोचनात्मक सोच का मतलब जिम्मेदार सोच है। यह अच्छे निर्णय के लिए जरूरी है।

बेहतर बनना है तो जनता से जुड़ें
सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों को जनता से संपर्क और संवाद की कीमत भी समझाई गई। कहा गया कि  इसके बिना न तो नेतृत्व क्षमता का विकास हो सकता है और न निर्णय क्षमता का। इसके लिए सोशल मीडिया को महत्वपूर्ण बताते हुए सभी से इस पर ध्यान देने की सलाह दी गई। बताया गया कि देश के 34 करोड़ लोग व्हाट्सएप से जुडे़ हैं।

इसलिए सोशल मीडिया पर सही जानकारी देकर कम समय में ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती है। यह भी समझाया गया कि गलत खबर आए तो उसका तुरंत खंडन करना जरूरी है, जिससे कोई भ्रम न फैलने पाए।  
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