गोमतीनगर की वैष्णवी की केजीएमयू में जांच कराई गई। उनका हीमोग्लोबिन 6.6 प्रतिशत प्रति मिलीग्राम निकला। प्लेटलेट्स काउंट 2.80 लाख सेल प्रति एमएम और टोटल ल्यूकोसाइट काउंट (टीएलसी) 11000 सेल पाया गया। दो दिन बाद यही जांच निजी पैथोलॉजी में कराने पर हीमोग्लोबिन 14.3 प्रतिशत, प्लेटलेट्स 3.40 लाख और टीएलसी 11050 पाया गया। ऐसे में इलाज करने वाले डॉक्टर ने केजीएमयू की रिपोर्ट के आधार पर दवाएं चलाईं। दो दिन बाद तीसरी जांच हुई, जो केजीएमयू की रिपोर्ट के आसपास रही। सप्ताहभर बाद बच्ची ठीक हो गई।
केस 2
महानगर निवासी युवती ने महात्मा गांधी रोड स्थित हाथी पार्क से ब्लड संबंधी जांच कराई। इसमें हीमोग्लोबिन 13.1 था और केजीएमयू में जांच कराने पर यह 12.5 फीसदी पाया गया। इसी तरह अन्य जांच रिपोर्ट भी अलग-अलग थीं। केजीएमयू की रिपोर्ट के आधार पर युवती का इलाज चला और अब वह ठीक है।
लखनऊ। राजधानी में पैथोलॉजी के नाम पर चल रहे खेल के ये उदाहरण बानगी भर हैं। जितनी पैथोलॉजी में जांच कराई जाए, उतनी तरह की रिपोर्ट आती हैं। ऐसे में इलाज प्रभावित होता है। कई बार डॉक्टर के हिसाब से लक्षण कुछ दिखता है और रिपोर्ट कुछ और आती है। ऐसे में दो से तीन बार जांच करानी पड़ती है। रिपोर्ट में आने वाले अंतर के पीछे बड़ी वजह सैंपल कलेक्शन में लापरवाही बताई जा रही है। इसे लेकर खुद पैथोलॉजी एसोसिएशन जागरूकता अभियान चला रही है। लोगों को भी ताकीद किया जा रहा है कि पंजीकृत पैथोलॉजी से ही जांच कराएं।
राजधानी में बड़े अस्पतालों, नर्सिंग होम और डायग्नोसिस सेंटर के तहत चलने वाली पंजीकृत पैथोलॉजी की संख्या 332 है। इसमें से कुछ के अलग-अलग स्थानों पर कलेक्शन सेंटर खुले हैं, लेकिन हकीकत एकदम अलग है। राजधानी के हर गली-मोहल्ले में पैथोलॉजी सेंटर का बोर्ड लगा दिख जाता है। यहां ब्लड सैंपल लेने वाले ज्यादातर अप्रशिक्षित टेक्नीशियन हैं। इनकी जरा सी चूक ब्लड जांच रिपोर्ट का परिणाम बदल देती है। पैथोलॉजी सेंटरों की जांच के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय की ओर से टीम बनाई गई है, लेकिन इसने जनवरी से अब तक किसी भी पैथोलॉजी सेंटर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की है।
क्या कहते हैं चिकित्सक
इलाज में जांच रिपोर्ट की अहम भूमिका होती है। लक्षण के आधार पर रक्त, यूरिन सहित अन्य जांच कराई जाती है। पैथोलॉजी की जांच रिपोर्ट से इलाज को दिशा मिलती है। उसके आधार पर दवाएं चलाई जाती हैं, लेकिन अचानक लक्षण के विपरीत जांच रिपोर्ट आ जाए तो दोबारा जांच कराना मजबूरी हो जाती है। पैथोलॉजी जांच रिपोर्ट के अलग-अलग होने के केस अक्सर आते हैं। ऐसे में बाहर के बजाय केजीएमयू की पैथोलॉजी रिपोर्ट के आधार पर ही मरीजों को दवाएं देते हैं।
डॉ. डी हिमांशु, एसोसिएट प्रोफेसर मेडिसिन विभाग, केजीएमयू
दो घंटे में सैंपल को जांच दायरे में लाना जरूरी
ज्यादातर पैथोलॉजी में आटोमेटेड मशीनें आ गई हैं। हालांकि, सैंपल का सही समय पर इन तक पहुंचना जरूरी होता है। सही रिपोर्ट के लिए ब्लड सैंपल को दो घंटे में जांच मशीन में लगा देना चाहिए। यदि इससे अधिक वक्त लग रहा है तो तापमान सामान्य रहना चाहिए. लेकिन चार घंटे के बाद सैंपल की जांच करने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होना तय है। यही वजह है कि कलेक्शन सेंटर पर सैंपल देने के बजाय पैथोलॉजी में सैंपल देना बेहतर होता है।
- डॉ. शीतल वर्मा, माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग केजीएमयू
सैंपल देते समय बरतें सावधानी
सैंपल देते समय भी सावधानी बरतने की जरूरत है। ब्लड सैंपल लेते वक्त जिस स्थान पर सुई चुभोई जाए, उसे साफ करना चाहिए। सैंपल लेने वाले का हाथ भी साफ होना चाहिए। यूरिन टेस्ट है तो सुबह-सुबह पहला यूरिन नहीं देना चाहिए। पहले एक बार यूरिन करने के बाद दूसरा लेना चाहिए। साथ ही प्राइवेट पार्ट को धोकर ही सैंपल लेना चाहिए। इसी तरह ब्लड सैंपल रखने के वायल भी अलग-अलग होते हैं। इसमें टेक्नीशियन की जरा सी चूक पूरी रिपोर्ट बदल देती है। सीरम संबंधी टेस्ट (एसजीपीटी) के लिए प्लेन वॉयल, सीबीसी संबंधी जांच में ईडीटी वॉयल और शुगर जांच के लिए फ्लोराइड वॉयल का इस्तेमाल होता है।
- अनिता सिंह, पैथोलॉजिस्ट केजीएमयू
क्या कहते हैं सीएमओ
अस्पतालों, पैथोलॉजी, डायग्नोसिस सेंटर के नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी हो गई है। नवीनीकरण के समय ज्यादातर सेंटर सभी व्यवस्थाएं मुकम्मल कर लेते हैं। फिर ढिलाई बरती जाती है। नवीनीकरण होने के बाद टीम को निर्देश दिया गया है कि औचक निरीक्षण कर स्थिति देखें।
- डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, सीएमओ लखनऊ।