राजधानी में दिल की सेहत लगातार कमजोर हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार दिल के मरीजों की संख्या हर दो सालों में दोगुनी हो जाती है।
हर पांचवां रोगी 40 वर्ष से कम उम्र का होता है। यानी, 40 से कम उम्र के 20 फीसदी लोग हृदय रोग से पीड़ित हैं। करीब 70 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनके हृदय रोग की गिरफ्त में जाने का खतरा मंडरा रहा है।
कारण है हृदय रोग को बढ़ावा देने वाली जीवनशैली। विशेषज्ञ कहते हैं कि दिल के रोगों को दूर भगाना है तो हमें ऐसी जीवनशैली बदलनी होगी।
‘हमारे यहां आउटडोर में हर रोज करीब 350 मरीज आते हैं। इनमें से औसतन 100 से 120 नए होते हैं।’ किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की लारी कॉर्डियोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ऋषि सेठी के इन शब्दों में शहर में बढ़ते हृदय रोगों की भयावहता साफ नजर आती है।
लारी के अलावा एसजीपीजीआई और डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज प्रमुख सुपर स्पेशियलिटी संस्थान हैं। इन संस्थानों में भी काफी मरीज पहुंच रहे हैं। पुराने मरीजों को मिला लें तो प्रमुख चिकित्सालयों की ओपीडी में रोजाना करीब 700 से 800 हृदय रोगी पहुंच रहे हैं।
आंकड़ों में हृदय रोग
- एक साल में लारी कार्डियोलॉजी में 2500 एंजियोग्राफी, 1300 एंजियोप्लास्टी, 500 पेसमेकर और 200 वॉल्व प्रोसीजर हुए।
- आरएमएलआईएमएस में करीब 800 एंजियोग्राफी, 500 एंजियोप्लास्टी, 360 पेसमेकर लगाए गए।
- एसजीपीजीआई में एंजियोप्लास्टी का आंकड़ा सर्वाधिक 1800 रहा।
जरूरत सुविधाएं बढ़ाने और बचाव की
चिकित्सकों के अनुसार मौजूदा सुविधाओं को तीन गुना बढ़ाने से अधिकतम लोगों को इलाज मुहैया हो सकेगा। फिर भी वे मानते हैं कि जीवन शैली में परिवर्तन से हृदय रोगियों की संख्या पर लंबे समय में काबू पाया जा सकता है।
रोजाना 700 मरीज, विशेषज्ञ महज 20
लखनऊ में यदि ओपीडी को ही देखें तो करीब 700 मरीज रोजाना आ रहे हैं। इन्हें देखने के लिए पांच अस्पतालों में महज 20 हृदय रोग डॉक्टर हैं।
इनमें से सबकी ओपीडी रोजाना नहीं होती। ऑपरेशन और भर्ती मरीजों को देखना और पढ़ाने में भी ड्यूटी रहती है। उदाहरण के तौर पर लारी कॉर्डियोलॉजी में रोजाना एक विशेषज्ञ की ड्यूटी ओपीडी में रहती है।