भारत को कई नए और फिर से पैदा हो रहे संक्रमणों के लिए एक ‘हॉट स्पॉट’ की तरह देखा जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर माइक्रोबायोलॉजी लैबोरेट्रियों में होने वाली जांचों के दौरान करीब 65 प्रतिशत गलतियां मानवीय भूल से हो रही हैं।
इन गलतियों की वजह से जहां संक्रमण का प्रसार हो सकता है वहीं रिपोर्ट भी गलत रिजल्ट दे सकती है और बहुत बड़ा दुष्प्रभाव बीमारियों व संक्रमण के खिलाफ जंग में पड़ सकता है।
लैब में 20 प्रतिशत गलतियां उपकरणों के फेल होने और 15 प्रतिशत गलतियां काम करने के असुरक्षित तरीकों से हो रही हैं।
इन्हें रोकने के लिए बायोसेफ्टी तौर तरीके अपनाने होंगे। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलॉजी के निदेशक डॉ. डीटी मौर्या ने केजीएमयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा सोमवार को आयोजित कंटीन्यूअस मेडिकल एजूकेशन और वर्कशॉप के मौके पर यह बात रखी।
यह वर्कशॉप संक्रामक रोगों की सूक्ष्म जांच विषय पर मेडिकल साइंस में आई अपडेट्स को लेकर आयोजित की गई।
आयोजन के वैज्ञानिक सत्र में डॉ. डीटी मौर्या ने बताया कि बायोसेफ्टी का प्रचलन1955 में अमेरिका के मैरिलैंड के एक आर्मी बेस कैंप से हुआ जो बायोलॉजिकल रणकौशल पर काम करता है।
इसके बाद लैबोरेट्री से जुड़े संक्रमण बढ़े और लैब में काम करने वालों को तो संक्रमण हुए ही इनके जरिए समुदायों में भी संक्रमण के खतरे पैदा हुए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन इन्हें रोकने के लिए बायोसेफ्टी नॉर्म्स की बात करता है। इसे अपनाकर हमारे अस्पताल सूक्ष्मजीवियों और विषों से वातवारण को दूषित होने, संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है।
भारत में हुए संक्रमण के मामले
डॉ. मौर्या ने बताया कि देश में पैनडेमिक इंफ्लूएंजा, एवियन इंफ्लूएंजा, सार्स कोरोना वायरस, गुजरात में क्रीमियन-कांगो हैरेज फीवर (2010), यासनुर फीवर कर्नाटक और तमिलनाडु (1957) नेपा वायरस सिलिगुड़ी, पश्चिम बंगाल (2001) जैसे मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में अब ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है।