इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन विभाग के सचिव को नसबंदी के बावजूद बच्चा होने के मामले में याची को मुआवजा देने पर विचार करने का निर्देश दिया।
इस मामले में सरकार का तर्क था कि महिला को मुआवजा पाने के लिए 90 दिन के भीतर आवेदन करना होता है। इसमें वह लेट हो गई।
याचिकाकर्ता कुसुमा ने बताया था कि बाराबंकी के सरकारी अस्पताल में वर्ष 2014 में उसने नसबंदी करवाई थी। इसके बावजूद वह गर्भवती हो गई और उसने एक बालिका को जन्म दिया।
नसबंदी विफल रहने पर उसने प्रदेश सरकार के मुआवजा स्कीम के तहत मुआवजे के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने इसे नकार दिया। इसके लिए 90 दिन बाद दावा करने का तर्क दिया गया।
इसकी वजह से उन्हें अपात्र माना गया। जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस इरशाद अली ने सुनवाई के बाद कहा कि याची समाज के निचले तबके से ताल्लुक रखती है। ऐसा संभव है कि उसके लिए समय अवधि के भीतर आवेदन करने में कुछ बाधाएं रही होंगी।
वहीं, सामने आए मामले के तथ्यों के आधार यह उचित होगा कि विभाग उसके दावे पर देरी के बजाय योग्यता के अनुसार विचार करे। इसके लिए उसे एक महीने की मोहलत दी जाती है।