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ब्लड ग्रुप न मिले तो भी ट्रांसप्लांट होगी किडनी

Sat, 15 Nov 2014 01:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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मरीज और दानदाता का ब्लड ग्रुप मैच नहीं होने पर भी अब किडनी ट्रांसप्लांट संभव है। संजय गांधी पीजीआई में ऐसे 15 सफल किडनी ट्रांसप्लांट हो चुके हैं।
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वैसे, इस तरह के ट्रांसप्लांट पर सामान्य से तीन गुना खर्च होता हैं, लेकिन इससे किडनी मिलने में आसानी हो जाती है।

यूरोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया और एसजीपीजीआई के संयुक्त तत्वावधान में ‘रीनल ट्रांसप्लांटेशन कांसेसनेस एंड कंट्रोवर्सी’ विषय पर पीजीआई में शुक्रवार को आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) में डॉ. अनीस श्रीवास्तव ने यह जानकारी दी।

एसजीपीजीआई के ट्रांसप्लांट सर्जरी और यूरोलॉजी विभाग के डॉ. अनीस ने बताया कि अभी यह स्थिति है कि ब्लड ग्रुप मैच नहीं किया तो मरीज को जिंदगी भर डायलिसिस पर रहना पड़ता है।
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ऐसे में ब्लड ग्रुप की मैचिंग से छुटकारा किडनी मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
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ट्रॉमा सेंटर शुरू हो तो मिले कैडवर

कैडवर (ब्रेन डेड बॉडी) ही प्रत्यारोपण के लिए जरूरी अंगों की कमी को पूरा कर सकता है। संजय गांधी पीजीआई अभी इसके लिए केजीएमयू पर निर्भर है।

वहां किडनी ट्रांसप्लांट शुरू होने पर यह सुविधा भी बंद हो जाएगी। इसलिए एसजीपीजीआई के ट्रॉमा सेंटर को जल्द शुरू करना सबसे जरूरी है।

डॉ. राकेश कपूर ने बताया कि अंगदाता न मिलने से प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे मरीजों को इससे राहत मिलेगी। डॉ. अनीस श्रीवास्तव ने बताया कि कैडवर प्रत्यारोपण बढ़ाने के लिए ट्रॉमा सेंटर के साथ ही अच्छे काउंसलर होना भी बहुत जरूरी है।

यदि काउंसलर अच्छे होंगे तो ब्रेन डेड मरीज के परिवारीजनों को अंगदान के लिए प्रेरित कर सकेंगे।

शुरुआती 10 दिन महत्वपूर्ण
डॉ. अनीस ने बताया कि ब्लड ग्रुप मैच न करने पर प्रत्यारोपण में दवाओं का खर्च बढ़ जाता है। इससे लागत तीन गुना तक हो जाती है, लेकिन इससे किडनी मिलने के मौके बढ़ गए हैं।
 
उन्होंने बताया कि एसजीपीजीआई में अभी तक 15 एबीओ इनकॉम्पटेबिल किडनी ट्रांसप्लांट हुए हैं। ये सभी सफल रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस तरह के प्रत्यारोपण में शुरुआती तीन से 10 दिन महत्वपूर्ण होते हैं।

क्योंकि इस दौरान मरीज का शरीर दान में मिले किडनी को रिजेक्ट कर सकता है। इसके बाद प्रत्यारोपण की सफलता सामान्य ट्रांसप्लांट की तरह बढ़ जाती है।
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