सियासी चौसर पर हर पार्टी अल्पसंख्यक वोट की जुगत में तमाम चालें चल रही है, लेकिन इस बीच एक तबका कहीं पीछू छूट गया है। अब सवाल यह है कि क्या कानूनी दर्जा इनकी तवज्जो बढ़ा पाएगा।
दरअसल, सभी पार्टियों ने एक ऐसे अल्पसंख्य समुदाय को हाशिये पर खड़ा कर दिया है जिसे मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी दर्जा तो दे दिया लेकिन राजनीतिक दलों की नजर में इनकी कोई अहमियत नहीं।
हालांकि, इस अल्पसंख्य समुदाय से भी कुछ लोगों ने जब-तब चुनावी मैदान में ताल ठोंकी है और जनता के प्रतिनिधि के रूप में विधानसभा में जगह भी बनाई है।
लेकिन, कुछ लोगों का मानना है कि वजह इनका लिंग है या फिर नंबर गेम, देश के सबसे बड़े चुनावी समर में इनकी स्वीकार्यता नहीं नजर आ रही।
इस फैसले से बदल सकती है तस्वीर
लंबे समय से अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे किन्नरों की मांग आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने सुन ली है। किन्नरों पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तीसरे वर्ग के रूप में ट्रांसजेंडर को मान्यता दी है। किन्नरों को ऐसा दर्जा देने वाला भारत दुनिया का पहला देश बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 14, 16 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर देश के नागरिक हैं और शिक्षा, रोजगार एवं सामाजिक स्वीकार्यता पर उनका समान अधिकार है।
अब तक इन्हें संविधान में लिंग की अन्य श्रेणी में गिना जाता रहा है, लेकिन अब लोगों को उम्मीद है कि अलग लिंग का कानूनी दर्जा मिलना इनके हक की लड़ाई को मजबूत करेगा।
पार्टियों को वोट तो चाहिए मगर...
सबसे बड़ी बात यह है कि इस तबके का बड़ा हिस्सा अब तक शिक्षा और रोजगार से दूर रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण समाज में इनकी स्वीकार्यता न होना ही रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक, इस समुदाय के सदस्य राकेश बताते हैं कि समुदाय के ज्यादातर लोगों के पास ऐड्रेस प्रूफ नहीं है।
इसकी वजह से वे वोटर आईडी कार्ड नहीं बनवा सके हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें वोटर आई कार्ड के रजिस्ट्रेशन की जानकारी तक नहीं है। वह बताते हैं कि करीब 75 फीसदी किन्नर आबादी के पास वोटर आईडी कार्ड नहीं है।
राकेश यह भी कहते हैं, 'बड़े राजनीतिक दलों ने हमसे समर्थन की मांग जरूर की है, लेकिन किसी ने भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि बिना वोटर कार्ड के हम वोट कैसे डालेंगे।'
पढ़ना चाहा, तो झेलनी पड़ी जलालत
जानकारों से बात करने पर पता चलता है कि इस समुदाय की अशिक्षा और हालात को देखते हुए खास किस्म के स्किल बेस्ड एजुकेशन प्रोग्राम शुरू करने की जरूरत है।
राकेश बताते हैं, 'ऐसी कोई भी जगह नहीं है, जहां हमारे जैसे लोगों के लिए शिक्षा की व्यवस्था हो। जितना भी हमें आता है, हम उतना ही एक-दूसरे को सिखाते हैं। फिर वह चाहे मेकअप हो या डांस।'
ऐसा नहीं है कि इस तबके के लोग नए जमाने के साथ कदम नहीं बढ़ाना चाहते। कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी बिरादरी के पेशे से हटकर कंप्यूटर सीखने की कोशिश की लेकिन सिर्फ जलालत ही झेलने को मिली।
सांसदों ने भी हमेशा खाली हाथ लौटाया
बिरादरी के ही अमित बताते हैं कि कुछ सांसदों ने उन्हें उनके लोगों के लिए जॉब और सिक्योरिटी का वायदा किया, लेकिन उन्होंने आज तक कुछ किया नहीं।
शर्मनाक बात तो यह है कि जब इस बिरादरी के लोग सांसदों से अपने लिए स्कूल और इंस्टीट्यूट बनाने के लिए फंड मांगने गए, तो भी इन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा।
हालांकि, जिन लोगों के पास वोटर आईडी कार्ड हैं वो चुनाव को लेकर जागरूक हैं। उन्होंने फैसला किया है कि वोट का सही इस्तेमाल करेंगे।
भरोसा ट्रस्ट के आरिफ जाफर कहते हैं, 'इस बार हम अपना वोट बेकार नहीं होने देंगे। इसीलिए, हम उस प्रत्याशी को ही वोट देंगे जिसके जीतने के चांस ज्यादा होंगे। ऐसे प्रत्याशी को तो कतई वोट नहीं देंगे, जो हमारे काम न आ सके।'