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अखिलेश के मुफ्त स्मार्टफोन पर भारी पड़ सकती हैं राहुल की यात्राएं!

Fri, 23 Sep 2016 03:30 AM IST
अनिल श्रीवास्तव /अमर उजाला, लखनऊ
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ब्राह्मण, दलित और मुसलमानों के समीकरण से लंबे समय तक सूबे में राज करने वाली कांग्रेस एक बार फिर इसी फार्मूले के बूते प्रदेश में अपना सियासी वजूद बनाए रखने के लिए हाथ-पांव मार रही है। हालांकि चुनाव से पहले राहुल गांधी की ‘किसान यात्रा’ के जरिये किसानों को पार्टी से जोड़ने की मुहिम इसमें नई बात है।
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किसानों की दर पर दस्तक देकर, उनसे सीधा संवाद करके उनका हितैषी होने का संदेश देने में राहुल जुटे हैं। ‘किसान यात्रा’ को रिस्पॉन्स भी ठीक-ठाक मिल रहा है।

पर, सूबे में जिस तरह के राजनीतिक और जातीय समीकरण हैं, उसमें राहुल की सभाओं में आने वाली भीड़ क्या वोट में तब्दील हो पाएगी, यह बड़ा सवाल है। ‘किसान यात्रा’ में राहुल अखिलेश सरकार से ज्यादा मोदी पर हमलावर हैं।
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मोदी विरोध विधानसभा चुनाव में सियासी तौर पर कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद होगा इस पर संदेह है। 2014 के लोकसभा चुनाव के अनुभवों को देखते हुए कांग्रेस के रणनीतिकार भी भीड़ के वोट में बदलने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन ‘किसान यात्रा’ को मिल रहे समर्थन को अच्छा संकेत जरूर माना जा रहा है।

2004 से कर रहे हैं कोशिश पर रहे नाकाम

क्षेत्रीय दलों के उदय के बाद ब्राह्मण, दलित व मुस्लिम समीकरण के छिन्न-भिन्न हो जाने से 27 साल से सूबे में कांग्रेस अपना सियासी वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। राहुल गांधी 2004 से ही सूबे में कांग्रेस को खड़ा करने की तमाम कोशिशें कर रहे हैं। पर, उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई है।

2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल ने अति पिछड़ों को साधने का दांव तो चला, पर वह भी नाकाम रहा। इस बार के चुनाव में कांग्रेस की रणनीति ब्राह्मण, ठाकुर और मुसलमानों को अपने पाले में लाने की है।

‘किसान यात्रा’ के जरिये दलित और ओबीसी पर भी डोरे डालने की कोशिशें हैं, लेकिन अभी यह समीकरण फिट बैठता नहीं दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकारों ने राहुल को किसानों के बीच खड़ा करके प्रदेश की सत्ता की चाबी हासिल करने का दांव चला है।

फौरी तौर पर भले ही ‘किसान यात्राओं’ में आ रही भीड़ कांग्रेस के लिए खुशफहमी पैदा करनी वाली हो, लेकिन इसे वोट की गारंटी नहीं माना जा रहा है।

निशाने पर सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

कांग्रेस खेती-किसानी को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों से उपजे असंतोष का फायदा उठाने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। ‘किसान यात्रा’ में राहुल के भाषणों को देखें तो यह साफ हो जाता है।

राहुल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मोदी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि दो साल से सूखे के हालात ने किसानों को हताशा की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।

राहुल किसानों की कर्ज माफी टालने, बिजली बिल कम नहीं करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाने को लेकर पीएम मोदी पर हमलावर हैं। यही नहीं राहुल नरेंद्र मोदी और बीजेपी को कॉरपोरेट हितैषी और गरीब विरोधी के तौर पर पेश करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं।

'स्मार्ट फोन से ज्यादा कारगर हो सकते हैं ये वादे'

राहुल ‘किसान यात्रा’ में वादों से भी किसानों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं। वादा किया जा रहा है कि अगर कांग्रेस  सत्ता में आती है तो वह किसानों का कर्ज माफ कर देगी और बिजली बिल आधा कर देगी।

किसानों के बीच ये वादे अखिलेश यादव के मुफ्त स्मार्टफोन के वादे से ज्यादा कारगर हो सकते हैं। जानकारों का कहना है कि किसानों के हित की बात कांग्रेस को ग्रामीण इलाकों में ऊंची जाति के लोगों का समर्थन भी दिला सकती है।

राहुल की रैलियों में उन किसानों को खास तौर पर बुलाया जा रहा है जो कर्ज के संकट से जूझ रहे हैं, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। पर, देखने वाली बात यह होगी कि वे किसानों का कितना भरोसा जीत पाते हैं।
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पर...‘लोकल कनेक्ट’ बनाने में नाकाम

‘किसान यात्रा’ के दौरान राहुल सभी जगह लगभग एक जैसा ही भाषण दे रहे हैं। राज्य सरकार से ज्यादा उनके निशाने पर भाजपा और मोदी रहते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों मे घूमने के बाद भी वे स्थानीय मुद्दों को उठाने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को ज्यादा उठाते हैं। ऐसे में कांग्रेस का ‘लोकल कनेक्ट’ नहीं बन पा रहा है।

अखिलेश सरकार के प्रति उनका नरम रुख भी उन वोटरों को कांग्रेस की ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है जो समाजवादी सरकार से नाराज हैं और दूसरा सियासी विकल्प तलाश रहे हैं।

मंदिर और दरगाह में भी हाजिरी
खास बात यह भी है कि इस बार राहुल गांधी अपनी ‘किसान यात्रा’ के दौरान मंदिर और दरगाह पर भी मत्था टेककर सूबे में पार्टी की वापसी के लिए प्रार्थना व दुआएं कर रहे हैं। अयोध्या में हनुमान गढ़ी गए तो दरगाह में भी दुआएं कीं।

विंध्याचल मंदिर के बाद चित्रकूट में कामदगिरि मंदिर भी गए। पहला मौका है जब चुनाव अभियान पर निकले राहुल ने इतने धर्मस्थलों पर मत्था टेका हो।
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