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यूपी में भाजपा ने हिंदुत्व के साथ खेला जातिवादी कार्ड

Sat, 09 Apr 2016 03:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा ने केशव मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की है। पार्टी रणनीतिकारों ने जहां यह साफ कर दिया है कि पार्टी यूपी के चुनावी समर में फिलहाल पिछड़ा कार्ड ही खेलेगी तो यह इरादा भी जता दिया है कि जरूरत पड़ी तो हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने से भी वह पीछे नहीं हटेगी। साथ ही युवाओं को आगे लाने के एजेंडे पर भी पार्टी का अभियान जारी रहेगा।
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केशव मौर्य के रूप में पहली बार किसी सांसद को प्रदेश अध्यक्षी की बागडोर मिली है। साथ ही भाजपा की कमान एक बार फिर पश्चिम से पूरब के हाथ आ गई है।

प्रदेश की पिछड़ी जातियों की लगभग 54 प्रतिशत आबादी में गैर मुस्लिम अति पिछड़ों की आबादी लगभग 24 प्रतिशत मानी जाती है। इनमें मौर्य, कुशवाहा, काछी, शाक्य जैसी बिरादरी की भागीदारी 8 प्रतिशत है। मौर्य से पहले कल्याण सिंह के रूप में लोध जैसी अति पिछड़ी जाति को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

ओमप्रकाश सिंह और विनय कटियार भी पिछड़े वर्ग से थे। लगातार तीन बार से अगड़ी जातियों के डॉ. रमापति राम त्रिपाठी, सूर्यप्रताप शाही और डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को अध्यक्ष बनाने के बाद मौर्य को यह जिम्मेदारी सौंपकर रणनीतिकारों ने इन आरोपों का जवाब देने की कोशिश की है कि भाजपा अगड़ों की पार्टी है।
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लोकसभा चुनाव के नतीजे भी रहे वजह

अति पिछड़ी जाति के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने के पीछे लोकसभा चुनाव के नतीजे भी एक बड़ी वजह रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद न सिर्फ भाजपा के रणनीतिकारों, बल्कि कई तटस्थ राजनीतिक विश्लेषकों ने भी स्वीकार किया था कि भाजपा की आंधी चलने की एक बड़ी वजह प्रदेश के पिछड़ों व दलित वोटों का बड़ी तादाद में भाजपा के प्रति रुझान रहा है।

माना जाता है कि भाजपा ने मौर्य को अध्यक्ष बनाकर उन्हीं समीकरणों पर आगे बढ़ने का संदेश दिया है। रणनीतिकारों का मानना है कि मौर्य के साथ पार्टी के बाकी पिछड़े नेताओं को जोड़कर प्रदेश में मुलायम सिंह के पिछड़ा कार्ड की काट की जा सकती है।

पूरब से पश्चिम तक समीकरणों पर ध्यान
भाजपा के गठन से लेकर अब तक प्रदेश अध्यक्ष के पद पर पूर्वी यूपी का ही वर्चस्व रहा है। अब तक जो 12 नेता प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए, उनमें से कल्याण सिंह और डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को छोड़कर पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहे। सिर्फ राजेंद्र गुप्त के रूप में एक बार मध्य उत्तर प्रदेश के हाथ इस पद की कमान रही।

केशव मौर्य को अध्यक्ष बनाने के पीछे भाजपा रणनीतिकारों का शायद यह भी मानना है कि मौर्य भले ही पूरब के हों लेकिन उनकी हिंदूवादी व भगवा छवि को देखते हुए पश्चिम में भी उनके प्रभाव और समीकरणों का असर दिखेगा। साथ ही जातीय गणित के सहारे पश्चिम के कई जिलों में फैले अपनी बिरादरी के लोगों के वोट हासिल करने में भी सफल रहेंगे।
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चुनौतियां भी कम नहीं केशव की राह में

केशव मौर्य ऐसे समय अध्यक्ष बनाए गए हैं जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने में लगभग आठ महीने ही बचे हैं। जाहिर है इतने कम वक्त में उन्हें सूबे में भाजपा की जीत का रास्ता तैयार करना है। यही नहीं, उन्हें संगठन के गठन की चुनौतियों से भी निपटना होगा।

अध्यक्ष के रूप में न सिर्फ उन्हें तीन दर्जन जिलों में नए जिलाध्यक्ष तलाशने हैं बल्कि सभी जिलों में पार्टी का संगठनात्मक ढांचा भी खड़ा करना है।

इसके अलावा उन्हें पार्टी के आधा दर्जन से अधिक मोर्चों और कई प्रकोष्ठों का गठन भी नए सिरे से करना है। साथ ही अपनी टीम के लिए उन्हें ऐसे सेनापति भी तलाशने हैं जो उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर 2017 के चुनाव में पार्टी की सफलता के लिए पूरी तरह सहयोग करें।

यूपी से कई बड़े नेताओं की केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका और सूबे के विभिन्न हिस्सों में उनके प्रभाव और हस्तक्षेप को देखते हुए अपनी पसंद की टीम बनाना आसान नहीं होगा।
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