केस 2 :
आशियाना के रहने वाले शैलेंद्र (45) को कई दिन से बुखार आ रहा था। सांस लेने में तकलीफ हुई। मरीज ने संस्थान की ओपीडी में दिखाया। डॉक्टर ने मरीज को पेट सिटी स्कैन जांच लिखी। जांच के लिए उसे दो माह बाद की तारीख दी गई। आखिरकार निजी सेंटर से जांच कराने पर पता चला कि मरीज को फर्स्ट स्टेज का लंग कैंसर है।
इतना ही नहीं मरीजों को दो से तीन गुना अधिक जांच शुल्क देना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि कुछ चुनिंदा निजी सेंटर से जांच कराने पर ही डॉक्टर रिपोर्ट को मान्य करते हैं। बाकी सेंटरों पर हजारों रुपये फूंकने के बाद भी डॉक्टर रिपोर्ट के आधार पर इलाज को तैयार नहीं होते। आरोप है कि डॉक्टर संस्थान में दोबारा जांच के लिए भी दबाव बनाते हैं। लोहिया संस्थान के अफसरों का कहना है कि वेटिंग का दबाव कम करने की कोशिश की जा रही है। संस्थान के प्रवक्ता डॉ. श्रीकेश ने माना कि पेट सीटी स्कैन के लिए करीब 15 दिन का इंतजार करना पड़ रहा है। मरीजों का दबाव बहुत अधिक होने से जांच के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ रहा है।
पेट सीटी स्कैन के लिए दो माह से अधिक की वेटिंग
लोहिया संस्थान में लगी पेट सीटी स्कैन मरीजों का हफ्ते में सिर्फ तीन दफा होता है। जबकि जांच के लिए आने वाले मरीजों की संख्या काफी अधिक है। इसकी वजह यह है कि एसजीपीजीआई को छोड़कर दूसरे किसी भी संस्थान में पेट सीटी स्कैन की सुविधा नहीं है। ऐसे में लोहिया संस्थान में आने वाले मरीजों को जांच के लिए करीब डेढ़ से दो माह का इंतजार करना पड़ रहा है। हफ्ते भर में महज 15 से 20 मरीजों की जांच हो पा रही है। जबकि 50 से 60 मरीजों से अधिक वेटिंग में हैं। संस्थान में जांच कराने पर मरीजों को महज आठ हजार रुपये देने पड़ रहे हैं। जबकि निजी सेंटर पर करीब 30 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।