1996 में बसपा की सीटें तो 1993 के बराबर 67 ही रहीं लेकिन उसने कांग्रेस का बेस वोट शेयर अपनी ओर खींच लिया। बसपा को कांग्रेस से गठबंधन में 19.64 फीसदी वोट मिला था और कांग्रेस वोट हिस्सेदारी में 8.35 प्रतिशत पर सिमट गई थी।
बसपा का थोड़ा कम-ज्यादा यह बेस अभी तक बरकरार है। पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न पाने के बावजूद बसपा का वोट शेयर 19.60 प्रतिशत था और 2017 के विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतने के बावजूद उसे 22.20 प्रतिशत वोट मिले थे।
...तो अन्य विकल्पों को तवज्जो देते हैं बसपा समर्थक
आंकड़े गवाह हैं कि बसपा समर्थक मतदाता सपा या कांग्रेस के विकल्प में आने पर अपने को उनके साथ सहज महसूस नहीं करता है। जब भी गठबंधन हुआ है, उसने अन्य विकल्पों को तवज्जो दी। 1991 में 221 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली भाजपा, 1993 में सपा-बसपा के बीच गठबंधन के बाद सत्ता से तो बाहर हो गई लेकिन उसका बेस वोट बढ़कर 33.30 प्रतिशत पहुंच गया। इसी तरह 1996 में बसपा-कांग्रेस से गठबंधन के दौरान उसे 32.52 फीसदी वोट मिले थे।
- पिछले पांच साल में सपा और बसपा दोनों ही लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हारकर न सिर्फ सांगठनिक रूप से कमजोर हुई हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी कमजोर हुई हैं।
- विधानसभा चुनाव के बाद से दोनों ही दल गठबंधन की दिशा में बढ़ने लगे थे। लिहाजा आंतरिक रूप से अनावश्यक खर्च को सीमित कर चुनिंदा क्षेत्रों तक फोकस रखा गया।
- दोनों दलों को पता है कि लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत न होने पर वे ‘किंग मेकर’ तो हो सकते हैं लेकिन ‘किंग’ की भूमिका में आना आसान नहीं है। इसलिए इस चुनाव में न्यूनतम संसाधन और अधिकतम उपलब्धि प्राप्त करने की रणनीति।
- दोनों ही दलों की नजर मुख्य रूप से विधानसभा चुनाव पर रहती है। ये अपने अधिकतम संसाधन को तब तक बचाए रखना चाहते हैं।