विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ने कहा कि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा 2011 से सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। लेकिन 2017 तक तो किसी को इस मामले की फाइलें खोलने तक की चिंता नहीं थी ना ही किसी के पास इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आठ हजार पेज के फैसले को पढ़ने का समय था। उन्होंने कहा कि राम मंदिर निर्माण के मामले में सितम्बर 2018 तक फैसला आ जाता लेकिन कुछ धर्मनिरपेक्ष संगठनों से जुड़े वकीलों ने कहा कि लोकसभा चुनाव 2019 के बाद इसका फैसला आना चाहिए।
अयोध्या के हंसदेवाचार्य ने कहा कि कांग्रेस के एजेंट कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 के बाद सुनवाई टालने की बात कही। उन्होंने कहा कि ऐसे गद्दारों को चिह्नित करना होगा कि कौन हिंदुओं की धार्मिक आस्था से खिलवाड़ कर रहा है। उन्होंने कहा कि संतों ने कहा कि आतंकी की फांसी सहित अन्य गैर जरूरी मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट रात में भी खुलता है, लेकिन करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा उनकी वरीयता में नहीं होना हिंदुओं का अपमान है।
डॉ. रामेश्वरदास ने कहा कि कुछ कथित धर्मनिरपेक्ष लोग मंदिर निर्माण को टालने की चाल चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने जल्द निर्णय नहीं दिया तो ऐसा न हो कि जनता ही रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण शुरू कर दे। श्रीधराचार्य महाराज ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को जनभावना का सम्मान करते हुए जल्द मंदिर निर्माण की सुनवाई का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
कमलनयनदास महाराज ने कहा धैर्य की परीक्षा समाप्त हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय को राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलनरत हिंदुओं की भावना को समझना चाहिए। यदि सर्वोच्च न्यायालय ने जनभावना को नहीं सुना तो जनता खुद ही मंदिर निर्माण शुरू कर देगी।