उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान। फाइल फोटो
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान को पूर्णकालिक निदेशक मिलने की आस एक बार फिर टूट गई है। अभी तक निदेशक का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे अपर मुख्य सचिव जितेंद्र कुमार दो दिन पूर्व सेवानिवृत्त हो गए। उनके स्थान पर शासन से नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव आलोक कुमार को भाषा व हिंदी संस्थान का भी अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है। लंबे समय से हिंदी संस्थान में अध्यक्ष की कुर्सी भी खाली है जिसके चलते पिछले कई वर्षों से यहां पुरस्कारों की घोषणा भी नहीं हो सकी है।
हिंदी संस्थान में निदेशक के पद पर 27 दिसंबर 2024 तक आरपी सिंह रहे। इसके बाद 28 दिसंबर 2024 को राज बहादुर ने कार्यभार संभाला लेकिन वे दो माह में ही गत 31 जनवरी 2025 को सेवानिवृत्त हो गए। इसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि जल्द ही संस्थान को नया निदेशक मिल जाएगा। कई अफसरों के नामों की चर्चा भी जोर-शोर से हो रही थी। लेकिन 10 फरवरी को विशेष सचिव ने आदेश जारी कर हिंदी संस्थान के निदेशक का अतिरिक्त चार्ज अपर मुख्य सचिव जितेंद्र कुमार को सौंप दिया। 30 जून को जितेंद्र कुमार भी सेवानिवृत्त हो गए। एक बार फिर इस बात की चर्चा हो रही थी कि शायद इस बार हिंदी संस्थान को कोई पूर्णकालिक निदेशक मिल जाएगा लेकिन शासन से नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव बनाए गए आलोक कुमार को हिंदी संस्थान का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया गया है। ऐसे में साहित्य गलियारों से लेकर हिंदी संस्थान तक इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि निदेशक पद पर स्थायी नियुक्ति न होने से कामकाज में तेजी आना संभव नहीं है।
अध्यक्ष की कुर्सी भी लंबे समय से खाली, लटकी है पुरस्कारों की घोषणा
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। यहां कार्यकारी अध्यक्ष का पद भी सितंबर 2024 के बाद से रिक्त है। डॉ. सदानंद गुप्ता के बाद से यहां किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी है। ऐसे में हिंदी संस्थान से मिलने वाले साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया भी लंबित पड़ी है। पिछले चार वर्षों से यहां पुरस्कारों की घोषणा नहीं हो सकी है जिसे लेकर साहित्यकारों में रोष भी है।