मंदित बच्चों व चलने-फिरने में असमर्थ दिव्यांग बच्चों के माता-पिता की तैनाती विकल्प प्राप्त करके ऐसे स्थान पर किए जाने की व्यवस्था की गई है, जहां उसकी उचित देखभाल व चिकित्सा की समुचित व्यवस्था हो। केंद्र सरकार से घोषित 8 आकांक्षी जिलों और 34 जिलों के 100 आकांक्षी विकास खंडों में में तैनाती संतृप्त किए जाने की व्यवस्था की गई है।
स्थानांतरण सत्र के बाद सीएम की अनुमति अनिवार्य
स्थानांतरण सत्र के बाद समूह क व ख के तबादले विभागीय मंत्री के माध्यम से मुख्यमंत्री के अनुमोदन से ही हो सकेंगे।
कैबिनेट ने तीन नए आपराधिक कानूनों के तहत तीन नियमों की गाइडलाइन को मंजूरी दी। भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ई-साक्ष्य, ई-समन और सामुदायिक सेवा से संबंधित मॉडल नियम (गाइडलाइन) इलाहाबाद हाईकोर्ट की सहमति से तैयार की गई है। इन नियमों के प्रभावी होने से समन ईमेल, मोबाइल और मैसेजिंग एप के जरिए भेजे जा सकेंगे।
उत्तर प्रदेश ई-साक्ष्य प्रबंधन नियम 2026 के जरिये डिजिटल साक्ष्यों के संकलन, संरक्षण और न्यायालय में प्रस्तुत करने की एक वैज्ञानिक एवं मानकीकरण व्यवस्था स्थापित की गई है। इससे साक्ष्यों की अखंडता (एंटिग्रिटी) और चेन ऑफ कस्टडी सुनिश्चित की जा सकेगी। उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रानिक आदेशिका (ई-समन) नियम, 2026 के तहत समन एवं वारंट इलेक्ट्रानिक तरीके से जारी हो सकेंगे। ईमेल, मोबाइल और मैसेजिंग एप के जरिए उनका तामीला कराया जा सकेगा।
इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। इसमें महिलाओं और बच्चों से संबंधित मामलों में पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने का विशेष प्रावधान भी किया गया है। वहीं उत्तर प्रदेश सामुदायिक सेवा गाइडलाइंस, 2026 के अंतर्गत छोटे अपराधों के लिए कारावास के विकल्प के रूप में 'सामुदायिक सेवा' को सुधारात्मक दंड के रूप में लागू किया गया है। इससे अपराधियों के पुनर्वास को प्रोत्साहन मिलेगा तथा कारागारों के भार में कमी आएगी। इसके अंतर्गत स्वच्छता, पौधरोपण, गौ-सेवा, यातायात प्रबंधन आदि सार्वजनिक कार्यों में सहभागिता का प्रावधान किया गया है।
यातायात नियमों का उल्लंघन करने समेत कई तरह के गैर शमनीय अपराध करने के बाद अब बचना नामुमकिन होगा। कैबिनेट ने इस बाबत सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिट याचिका पर दिए गए आदेश का पालन करने के लिए उप्र आपराधिक विधि (अपराधों का शमन और विचारणों का उपशमन) (संशोधन) अध्यादेश लाने के गृह विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। यह अध्यादेश बीती 7 अप्रैल को भी कैबिनेट में मंजूर हुआ था हालांकि विधानसभा सत्र के दौरान पारित नहीं हो सका। इसकी वजह से इसे दोबारा कैबिनेट के सामने पेश करके सदन के पटल पर रखने की मंजूरी दी गई।
इसके तहत गैर शमनीय अपराध पूर्व की तरह उपशमित (समाप्त) नहीं होंगे। अध्यादेश में संशोधन के बाद जिन अपराधों में अनिवार्य कारावास का दंड है, वे अपराध जो प्रथम अपराध नहीं हैं, अर्थात वे बाद के अपराध है, वे पूर्व की भांति स्वत: समाप्त नहीं होंगे। खासकर यातायात नियमों के उल्लंघन के कुछ मामले स्वत: समाप्त नहीं होंगे। उदाहरण के लिए यदि वर्तमान में किसी व्यक्ति के द्वारा मोटर वाहन अधिनियम के तहत अपराध किया गया है और वह जुर्माना नहीं देता है तो एक समय बीतने के बाद कार्यवाही स्वत: समाप्त हो जाती है।
अब उसे भी दंड का सामना करना होगा। साक्ष्यों के आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इससे नियमों का उल्लंघन करने वालों के भीतर कानून का भय उत्पन्न होगा, जिससे अपराधों में कमी आएगी। बता दें कि उप्र आपराधिक विधि (अपराधों का शमन और विचारणों का उपशमन) (संशोधन) अध्यादेश, 2023 मजिस्ट्रेट के सामने लंबित छोटे आपराधिक मामलों को समाप्त करने का प्रावधान करता है। यह अदालती बोझ कम करने के लिए समझौता या शमन (कंपाउंडिंग) की अनुमति देता है। यह विभिन्न कानूनों जैसे मोटर वाहन एक्ट 1939, न्यूनतम वेतन एक्ट 1948, पुलिस एक्ट 1861, और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत किए गए अपराधों पर लागू होता है।