अक्ल दाढ़ का गायब होना बड़ा संकेत
प्रो. नवनीत के अनुसार, देश में हुए कई ताजा अध्ययन बताते हैं कि लंबे अरसे से उपयोग में न रहने के कारण अब बड़ी संख्या में युवाओं में अक्ल दाढ़ निकलती ही नहीं। पहले आदि मानवों को कठोर भोजन, कंद-मूल, मांस चबाने के लिए बड़े जबड़े और अक्ल दाढ़ की जरूरत पड़ती थी। बाद में नरम, पका खाना, फास्ट फूड की आदतें और कम चबाने वाले आहार के कारण जबड़ा छोटे होने लगे। अब के दौर में लगभग 30 फीसदी लोगों में 32 की जगह 30 दांत ही निकलते हैं।
नई पीढ़ी में घट रही याद रखने की क्षमता
उप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुमित कुमार श्रीवास्तव ने ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड में अनुवंशिक विकास से जुड़े शोध का हवाला देते हुए बताया कि हमारा शरीर आधुनिक दुनिया के अनुसार खुद को री-डिजाइन कर रहा है।
बीते कुछ अरसे में हमारे कई मसल व अंग शरीर के लिए गैरजरूरी एसेसरीज जैसे बन गए हैं। दिमाग पर भी तकनीक का गहरा असर है। मोबाइल, स्क्रीन और सुविधा वाले युग में जेन-जी में याद रखने की क्षमता घट रही है। निर्णय क्षमता तेज, लेकिन सतही हो गई है। मल्टीटास्किंग बढ़ी है और सूचना ग्रहण करने व समझने का तरीका बदल गया है।
जेन-जी में धीरे-धीरे गायब हो रहे अंग
प्रो. नवनीत बताते हैं कि बीते दो दशक के अवलोकन में सामने आ चुका है कि मनुष्य उन अंगों को खो रहा है जिनकी शरीर में उपयोगिता खत्म हो चुकी है। इन अंगों और मांसपेशियों को इस तरह से समझा जा सकता है।
अहम बातें
तकनीक, तनाव और बदलती जीवनशैली के बीच मनुष्य का शरीर एक बार फिर विकास के नए मोड़ पर खड़ा है। मानव विकास की कहानी खत्म नहीं हुई। अब यह हमारे डीएनए के भीतर चुपचाप आगे बढ़ रही है। यहां बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि हमारी नसों में लिखी जा रही नई जीव-वैज्ञानिक कहानी है।