जलवायु की असामान्य परिस्थितियों के कारण मानसून की अनिश्चितता बनी हुई है। अभी तक सामान्य से 56 प्रतिशत बारिश कम हुई है। इससे सभी जिले प्रभावित हुए हैं। ऐसे में किसानों से फसल बीमा कराने की अपील की गई है। 31 जुलाई से पूर्व निर्धारित वित्तमान के मात्र दो प्रतिशत प्रीमियम पर अपनी अधिसूचित खरीफ फसलों का बीमा कराया जा सकता है।
धान की रोपाई वाले खेतों में एक फीट ऊंची मेड़ बनाने की सलाह दी गई है ताकि बारिश का पानी संचित हो सके और नर्सरी में पानी का ठहराव न होने देने के निर्देश दिए गए हैं। कम पानी में बेहतर उत्पादन के लिए धान की सीधी बुआई (डीएसआर) पद्धति अपनाने और कम समय में तैयार होने वाली प्रजातियों जैसे सीआर धान-100, 101, 103, आईआर-64 और एनडीआर-97 का चयन करने को कहा गया है। रोपाई के लिए 20 से 25 दिन की पौध को दो-तीन पौधा प्रति हिल और तीन-चार सेंटीमीटर की गहराई पर लगाने का सुझाव दिया गया है।
आकस्मिक फसल योजना के अंतर्गत कम पानी की मांग वाली और सूखा सहनशील फसलों पर विशेष बल दिया गया है। ज्वार, बाजरा, सावां, कोदो और रागी जैसी श्री अन्न फसलें केवल वर्षा के जल से अच्छा पैदावार देने की क्षमता रखती हैं। इनमें कीटों व रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
दलहनी फसलों में अरहर की बुआई मेड़ या रिज बनाकर करने की सलाह दी गई है ताकि वर्षा जल का सदुपयोग हो सके। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपनाने और मिश्रित खेती के तहत मक्का के साथ अरहर या मूंग उगाने पर जोर दिया गया है।