तावड़े की नियुक्ति को सामाजिक समीकरणों के नजरिये से भी देखा जा रहा है। उनकी कुर्मी पृष्ठभूमि और बिहार में ओबीसी समीकरण साधने का अनुभव चर्चा में है। यूपी में कुर्मी और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को भाजपा के साथ मजबूती से जोड़े रखना अहम होगा। अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे सहयोगी दलों से बेहतर तालमेल भी तावड़े की जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सीटों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सहयोगियों की अपेक्षाएं बढ़ेंगी। विधानसभा चुनाव में गठबंधन का वोट एक-दूसरे को हस्तांतरित हो, यह सुनिश्चित करना चुनौती होगी।
2027 में टिकट वितरण सबसे कठिन दौर में से एक होगा। मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, नए चेहरों की मांग और जातीय समीकरण में संतुलन बनाना होगा। टिकट कटने वाले नेताओं की नाराजगी को चुनाव से पहले संभालना भी जरूरी है। भाजपा का चुनावी ढांचा बूथ स्तर की मजबूती पर आधारित है। कमजोर बूथों की पहचान कर बूथ समितियों को सक्रिय करना तावड़े के एजेंडे में रह सकता है। 2027 विधानसभा चुनाव के नतीजे 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे, इसलिए तावड़े पर दोनों चुनावों के लिए संगठन तैयार करने की जिम्मेदारी होगी।