- मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध आधारभूत संरचना।
- कार्यरत चिकित्सा संकायों की तीन माह की उपस्थिति।
- कार्यरत चिकित्सा संकायों की छह माह की सैलरी स्लिप।
- ओपीडी, आईपीडी, ओटी सहित अन्य क्लीनिकल मैटेरियल की अलग-अलग रिपोर्ट।
- अध्ययनरत विद्यार्थियों से लिए जा रहे शिक्षण शुल्क का ब्योरा।
- अध्ययनरत विद्यार्थियों से वार्ता कर गुणवत्ता संबंधित फीडबैक।
- मौके पर जांच कमेटी को जो अन्य जरूरी बिंदु लगे।
निजी कॉलेज संचालक इस औचक निरीक्षण को उत्पीड़न मान रहे हैं। अमर उजाला से बातचीत में (नाम नहीं छापने की शर्त पर) कई कॉलेज संचालकों ने बताया कि आधारभूत सुविधाएं सहित अन्य बिंदुओं की जांच के बाद ही उन्हें मान्यता मिली है। सत्र चालू है। ऐसे में डीजीएमई की टीम को जांच का अधिकार नहीं है। कुछ कॉलेज संचालकों ने यह भी आरोप लगाया है कि उन्होंने फीस निर्धारण के मामले में हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर रखा है। इस वजह से भी उनकी जांच कराई जा रही है। उन्होंने कहा, पहले सरकारी कॉलेजों की व्यवस्थाएं दुरुस्त की जाएं। फिर उन्हें निजी कॉलेजों के लिए नजीर के रूप में पेश किया जाए।
नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने सभी कॉलेजों को वार्षिक घोषणा पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। सभी कॉलेजों को अपनी बेवसाइट बनाकर संकाय सदस्यों का ब्योरा देने व बायोमीट्रिक हाजिरी का भी निर्देश दिया है। जांच कमेटी इन बिंदुओं पर फोकस नहीं कर रही है।