भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश में एटी एंड सी हानियों का अनुमोदन किया है। इसमें दक्षिणांचल की 18.49 और पूर्वांचल की 18.97 फीसदी है। जबकि काॅर्पोरेशन के प्रस्ताव में दक्षिणांचल की 39.42 फीसदी और पूर्वांचल की 49.22 फीसदी दिखाई गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके पीछे कुछ अधिकारियों की उद्योगपतियों को उपकृत करने की मंशा है। इसी तरह स्टैंडर्ड बिडिंग गाइडलाइन में भी नियमों को दरकिनार किया गया है। दोनों निगमों की परिसंपत्तियां करीब लगभग 80 हजार करोड़ हैं, जिसमें आरडीएसएस योजना सहित विभिन्न योजनाओं के तहत चल रहे कार्य भी हैं। इसके बाद भी भारत सरकार का नियम है कि निगम की कुल परिसंपत्तियों के आधार पर ही उसे अधिग्रहित करने वाली कंपनी की माली हालत 30 फीसदी होनी चाहिए। यदि निगमों के आधार पर देखें तो इन्हें अधिग्रहित करने वाली कंपनी की माली हालत 24 हजार करोड़ होनी चाहिए। इसे पांच हिस्से में बांटा जाए तो नई बिजली कंपनी की माली हालत कम से कम 4800 करोड़ जरूरी है, लेकिन प्रस्ताव में नई बनने वाली कंपनी की टेंडर प्रक्रिया की शर्तों में रिजर्व बीडिंग में शामिल होने वाली कंपनी की माली हालत सिर्फ दो हजार करोड़ ही रखी गई है।
वर्मा ने दावा किया कि प्रस्ताव में आरक्षित निविदा मूल्य 2000 करोड़ आकलित करते हुए गोरखपुर कलस्टर की न्यूनतम निविदा मूल्य करीब 1010 करोड़, काशी कलस्टर की करीब 1650 करोड़, प्रयागराज कलस्टर की करीब 1630 करोड़, आगरा-मथुरा कलस्टर की करीब 1660 करोड़, झांसी-कानपुर कलस्टर की करीब 1600 करोड़ रुपया आंका गया है। स्टैंडर्ड गाइडलाइन के हिसाब से उत्तर प्रदेश की यह निविदा पीपीपी मॉडल एटी एंड सी हानियों के आधार पर होनी चाहिए। परिषद के अध्यक्ष ने गलत आंकड़े पेश करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। यह भी कहा कि इस मामले को लेकर संवैधानिक लड़ाई लड़ी जाएगी।