याचिकाकर्ता ने यह याचिका वर्ष 2013 में दायर की थी। उसका कहना था कि उत्तर प्रदेश में जातियों पर आधारित राजनीतिक रैलियों की बाढ़ आ गयी है। सियासी दल ब्राहमण रैली, क्षत्रिय रैली, वैश्य सम्मेलन आदि नाम देकर अंधाधुंध जातीय रैलियां कर रहे हैं। जिनपर रोक लगाई जानी चाहिए।
दरअसल, 11 जुलाई 2013 को कोर्ट ने को एक अहम आदेश में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर की जा रही राजनीतिक दलों की रैलियों पर तत्काल रोक लगा दी थी। साथ ही इन पक्षकारों को नोटिस जारी की थी।याची का तर्क था कि इससे सामाजिक एकता और समरसता को जहां नुकसान हो रहा है वहीं, ऐसी जातीय रैलियां तथा सम्मेलन समाज में लोगों के बीच जहर घोलने का काम कर रहे हैं, जो संविधान की मंशा के खिलाफ है।
गौरतलब है कि 2013 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा ने प्रदेश के करीब 40 जिलों में ब्राहमण भाईचारा सम्मेलन आयोजित किये थे। उसके अलावा सपा ने भी पहले लखनऊ में ऐसा ही सम्मेलन किया था। साथ ही उसने मुस्लिम सम्मेलन भी आयोजित किये थे। इसी परिप्रेक्ष्य में याची ने जातीय रैलियों पर तत्काल रोक लगाने की यह याचिका वर्ष 2013 में दाखिल की थी।