मस्तिष्क की जांच में वेद पाठ करने वालों के सेरिबेलम और उसके आसपास के पिछले क्षेत्रों में अधिक गतिविधि पाई गई। सेरिबेलम केवल शरीर का संतुलन नियंत्रित नहीं करता, बल्कि बोलने की लय, सही समय पर ध्वनि निकालने, शब्दों को सही क्रम में बोलने और मौखिक जानकारी को मन में दोहराने में भी सहायता करता है।
सेरिबेलम के भीतर बेहतर स्थानीय तालमेल भी देखा गया। इसी तरह पोस्टसेंट्रल और पैराइटल क्षेत्रों में भी अधिक तालमेल पाया गया। ये क्षेत्र शारीरिक संवेदना, ध्यान, वाणी से जुड़ी गतिविधियों और क्रमबद्ध जानकारी को संभालने में सहायता करते हैं। लंबे मंत्रों को बिना रुके और सही क्रम में बोलते समय इन क्षमताओं की लगातार आवश्यकता पड़ती है।
अध्ययन के दौरान वेद पाठ करने वालों और सामान्य लोगों के मस्तिष्क में कई तरह के बदलाव देखे। मुख्य अध्ययनकर्ता डा. उत्तम कुमार ने बताया कि वर्षों तक वेद पाठ का प्रशिक्षण लेने वालों में सुनाई गई जानकारी को तुरंत याद करने और सही क्रम में दोहराने की क्षमता अधिक पाई गई है। उनके मस्तिष्क के उन हिस्सों में भी विशेष गतिविधि और तालमेल देखा गया, जो सुनने, बोलने, ध्यान लगाने, शब्दों का क्रम बनाए रखने और उन्हें याद करने में सहायता करते हैं।
इनके मस्तिष्क के अलग- अलग हिस्से का आकलन किया गया तो पाया गया कि वेदपाठ करने वालों में नई जानकारी को तुरंत याद करके दोहराने में स्पष्ट बढ़त दिखाई। उम्र और सामान्य तर्क क्षमता को ध्यान में रखने के बाद भी यह अंतर बना रहा। एक-तिहाई ने तत्काल स्मरण परीक्षण में पूरे अंक प्राप्त किए, जबकि वेदपाठ नहीं करने वालों में कोई भी प्रतिभागी पूरे अंक प्राप्त नहीं कर सका।
लिखने के बजाय बोलकर याद करना फायदेमंद
सीबीएमआर के एडिशन प्रोफेसर एवं मुख्य अध्ययनकर्ता डा. उत्तम कुमार के मुताबिक अध्ययन के परिणाम वैदिक शिक्षा की उस दैनिक प्रक्रिया से मेल खाता है जिसमें विद्यार्थी गुरु को ध्यान से सुनता है और मंत्र को उसी ध्वनि, लय और क्रम में दोहराता है। गलती होने पर उसे तुरंत सुधारा जाता है। केवल पढ़ने के बजाय सुनकर और बोलकर याद करने का अभ्यास ज्यादा फायदेमंद है।
डॉ. उत्तम कुमार ने कहा कि वेद पाठ केवल मंत्र याद करने की प्रक्रिया नहीं है। इसमें सुनना, ध्यान देना, शुद्ध उच्चारण, लय, क्रम और गलती का तत्काल सुधार एक साथ शामिल हैं। यह शोध भारत की प्राचीन मौखिक शिक्षा परंपरा और आधुनिक मस्तिष्क विज्ञान के बीच सेतु बनाता है। सुनकर सीखने, बोलकर दोहराने, नियमित स्मरण-अभ्यास, लय के उपयोग और तुरंत प्रतिक्रिया देने जैसी विधियों को आधुनिक शिक्षा में भी वैज्ञानिक रूप से विकसित और जांचा जा सकता है।
दुनिया का पहला अध्ययन होने का दावा
डा. उत्तम कुमार का दावा है कि यह दुनिया का पहला अध्ययन है, जिसमें वैदिक विद्वानों की स्मरण क्षमता को मस्तिष्क की आराम की अवस्था में होने वाली गतिविधि और संपर्क के कई स्तरों के साथ एक साथ जांचा गया। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल ट्रेंड्स इन न्यूरोसाइंस एंड एजुकेशन प्रकाशित हुआ है। अध्ययन टीम में हिमांशु राज पांडेय, कल्पना धानिक और अंशिता सिंह शामिल रहे।