फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूपी की सियासत भी बदलेगी करवट

Wed, 11 Feb 2015 08:45 AM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लख्ानऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
दिल्ली के चुनाव नतीजे से केवल वहां के तख्त पर बैठने वाले का चेहरा नहीं बदलेगा। यह एक ऐसा जनादेश है, जिसमें भविष्य की सियासत के गहरे संदेश छिपे हैं। सबसे बड़े प्रदेश यूपी के लिए भी इस संदेश में बहुत कुछ छिपा है।
विज्ञापन


पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद माना यही जा रहा था कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने केवल सपा ही मुख्य मुकाबले में दिखेगी। लेकिन अब शायद ऐसा नहीं होगा।

उस चुनाव नतीजे ने यूपी की सियासी समीकरण में भारी फेरबदल किया था। प्रदेश की जनता ने भाजपा को भारी जनादेश देकर देश की गद्दी सौंपने के लिए सत्ताधारी सपा को हासिये पर धकेल दिया था। प्रदेश की विपक्षी पार्टी बसपा को पूरी तरह नकार दिया था।
विज्ञापन


जनता के प्रकोप से कांग्रेस से दिग्गज बमुश्किल लाज बचा पाए। मई में केंद्र की सत्ता पाने से लेकर अब तक भाजपा के लिए प्रदेश में कमोबेश अच्छे ही दिन माने जा रहे थे, क्योंकि उप चुनाव में हार के बाद भी 2017 के हीरो के तौर पर उन्हें ही देखा जा रहा था।

भाजपा से डरकर सत्ताधारी करते रहे बयानबाजी

प्रदेश की इस सियासी तस्वीर का भय सबसे अधिक सत्ताधारी दल पर दिखता भी रहा। वह विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बसपा से अधिक भाजपा पर हमलावर दिखने की कोशिश करती रही। वजह साफ थी। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही एक तरह से उल्टी गिनती शुरू हो गई थी।

मौजूदा कार्यकाल पूरा होने में दो साल से भी ज्यादा वक्त होने के बावजूद यूपी में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव और उनके संभावित नतीजों को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहीं। केंद्र में सत्तासीन भाजपा के यूपी मिशन को भी मीडिया और सियासी महफिलों में खासी तवज्जो मिलती रही है।

कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा को यूपी में अगली सरकार के सबसे बड़े दावेदार के रूप में देखा जाने लगा। इन चर्चाओं से डरे- सहमे सत्ताधारी दल के नेता भी भाजपा के खिलाफ बयानबाजी कर अपनी और उनकी अहमियत बढ़ाने में पीछे नहीं रहते।
विज्ञापन

....तो बदल सकते हैं समीकरण

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत ने भाजपा के अजेय होने पर बट्टा ही नहीं लगाया बल्कि यह भी संकेत दिया है कि वोटर बेहद समझदारी से वोट करने लगे हैं। उन्हें एक जैसी बात, पुराने जुमले और केवल वादों की घुट्टी पसंद नहीं।

वे अपने वोट को फैसला इस आधार पर नहीं करते कि कौन किस पर कितने तीखे हमले की ताकत रखता है। वे शायद उन्हें वोट करना चाहते हैं जो उनके लिए हालत बदलने की सोच रखते हैं। अपने वादों के लिए ईमानदार दिखते हैं। दिल्ली की जनता ने पार्टियों को उनकी जमीन का अहसास कराया है और देश के वोटर को राह दिखाई है।

निश्चित ही आने वाले समय में सियासी दलों को इसका अहसास होगा। दिल्ली के सियासी सबक ये हैं कि वोटरों के नए अंदाज के साथ ही भाजपा विरोधी दल प्रदेश में अपनी नई ताकत बटोरकर उनसे कड़े मुकाबले की हिम्मत कर सकते हैं।

इसके अलावा यदि आम आदमी पार्टी खुद को यूपी के चुनाव के लिए तैयार करती है तो वे यहां के समीकरण बदल सकते हैं, जो अभी तक आम तौर पर केवल जातीय आधार पर तय होते हैं। जाहिर है प्रदेश में अगला सियासी युद्ध मुख्य तौर पर केवल भाजपा और सपा के बीच का नहीं रहने वाला।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें