दवाओं के अलावा मेडिकल उपकरणों के मूल्य में भी बड़ा अंतर मिला। एक 3-तरफा स्टॉप कॉक की खरीद कीमत 6.40 रुपये थी, जबकि एमआरपी 163 रुपये पाई गई। यह खरीद कीमत के मुकाबले करीब 25 गुना अधिक है। एक अन्य मेडिकल उपकरण की खरीद कीमत 20.95 रुपये के मुकाबले एमआरपी 500 रुपये मिली। यह अंतर करीब 24 गुना रहा। विभागीय विश्लेषण में ऊंचे व्यापार लाभ और छूट की गुंजाइश बनाए रखने के लिए एमआरपी ऊंची रखने की आशंका जताई गई है।
लगातार बढ़ रही हैं दवा की कीमतें
निजी अस्पतालों में भी मोनोपॉली दवाओं के जरिए मरीजों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। फार्मेसी में ऐसी मोनोपॉली दवाएं रखी जाती हैं, जो खुले बाजार में उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे में मरीजों को अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदनी पड़ती है। इसका फायदा उठाकर इन दवाओं पर अपेक्षाकृत अधिक एमआरपी रखी जाती है। दवा की उपलब्धता सीमित होने पर मरीज और तीमारदार उसके वास्तविक बाजार मूल्य की तुलना भी नहीं कर पाते। मरीजों को मजबूरी में इन्हें खरीदना पड़ता है, जिससे बिल काफी बढ़ जाता है।