गोरखपुर के घंटाघर हरबंश गली स्थित घर में 20 नवंबर 1964 में जन्मे पंकज चौधरी ने एमपी इंटर कॉलेज और गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण की। औद्योगिक घराने में जन्मे पंकज चौधरी ने राजनीति में कदम रखा और नगर निगम गोरखपुर में 1989 में पार्षद बने और डिप्टी मेयर बने। महराजगंज में पंकज के लिए राजनीतिक जमीन उनके भाई स्वर्गीय प्रदीप चौधरी ने तैयार की। वह महराजगंज के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष थे। वे ही पंकज को अपने साथ लाए और उन्हें स्थापित किया। पंकज ने भी अपनी राजनीतिक समझ से धीरे-धीरे अपनी पहचान बना ली। राम लहर में 1991 में पहली बार भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उसके बाद से वह महराजगंज के ही होकर रह गए। अब तक दो बार ही (1999 और 2009 के लोकसभा चुनाव) में ही पंकज को हार का सामना करना पड़ा। पीएम नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में पहली बार केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री बने और तीसरे कार्यकाल में भी उन्हें दोबारा यह जिम्मेदारी मिली।
केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर नामांकन करने के बाद बधाई देते उप मुख्यमंत्री
राजनीति में बड़े मुकाम पर आने के बाद भी पंकज ने कभी अपनी सादगी नहीं छोड़ी। छोटे से छोटे कार्यकर्ता को तरजीह देते हैं। ब्लॉक गेट पर चाय की दुकान चलाने वाले सत्तन वर्मा भावुक होकर कहने लगे की मंत्री बनने के बाद भीड़ में भी मेरा नाम लेकर बुलाते हैं। यह हमारे के लिए बड़ी बात है। सत्तन ने बताया कि जिले के लिए गौरव का विषय है। जब कभी मिलता हूं तो वह हंसकर हालचाल पूछते हैं। कोई बनावटी पन नहीं रहता है। एक देशी अंदाज में बातचीत करने हृदय को द्रवित कर देता है।
सूबे के नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने जा रहे पंकज चौधरी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा शिवपति इंटर कॉलेज शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर) से 1983 में उत्तीर्ण की। उन्होंने अपनी बड़ी बहन साधना चौधरी के पास रहकर माध्यमिक की पढ़ाई पूरी की थी। साधना पंकज की बड़ी बहन और बढ़नी के घरुआर एस्टेट की मालकिन व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सिद्धार्थनगर रह चुकी हैं। साधना ने बताया कि पंकज ने उनके पास रहकर इंटर तक पढ़ाई पूरी की थी। वह समय- समय पर प्रत्येक कार्यक्रम में पहुंचते हैं। पिछले माह दीपावली के बाद भैया दूज में आशीर्वाद लेने पहुंचे तो पूरा दिन गांव वाले घर पर बिताया। इस दौरान पुरानी याद ताजा करते रहे। उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने पर बहन के परिवार ही नहीं पूरे घरुआर में जश्न है।
कई महीने की मशक्कत और मंथन के बाद भाजपा ने पूर्वांचल के कद्दावर नेता और सात बार के सांसद व केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी पर दांव ऐसे नहीं लगाया है। इसके पीछे कई सियासी कारण हैं। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान देकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पिछड़ों को साधने के साथ ही विपक्ष के पीडीए समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश की है। यहीं नहीं, भाजपा ने पंकज चौधरी के सहारे अपने परंपरागत कुर्मी वोट को भी साथ रखने का प्रयास किया है। साथ ही कार्यकर्ताओं को यह भी संदेश दिया है कि भाजपा अपने मूल काडर की कीमत को भूलती नहीं है।
दरअसल, यादवों के बाद पिछड़ों में सबसे अधिक प्रभावशाली रही कुर्मी बिरादरी भाजपा का कोर वोट बैंक रही है। लेकिन, पार्टी में तमाम कुर्मी नेताओं के होने और अपना दल (एस) के साथ होने के बाद भी 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा कुर्मी वोट बैंक में भारी सेंधमारी करने में सफल रही है। इसके कारण भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और 2019 में 62 लोकसभा सीट जीतने वाली भाजपा 2024 में 36 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई। तभी से पार्टी नेतृत्व इस नुकसान की भरपाई के लिए एक ऐसे चेहरे को तलाश रहा था, जो कुर्मी वोट बैंक को फिर से अपने पाले में कर पाए।
यह भी माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में अनुप्रिया पटेल जैसा बड़ा कुर्मी चेहरा होने के अलावा पार्टी के भीतर करीब दो दर्जन से अधिक कुर्मी विधायकों और तमाम राज्य व क्षेत्रीय स्तर पर संगठन के तमाम पटेल नेताओं के होते हुए पार्टी का भारी कुर्मी वोट बैंक खिसक गया था। पार्टी के मंथन में देखा गया कि लोकसभा चुनाव में मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र के कुर्मी बहुल मड़िहान और चुनार विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी वोट एनडीए से छिटका था। मड़िहान में तो भारी नुकसान हुआ था। वहीं, वाराणसी संसदीय क्षेत्र में रोहनियां और सेवापुरी जैसे कुर्मी बहुल विधानसभा क्षेत्र के साथ ही अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी कुर्मी वोट घटने से पीएम मोदी की जीत का अंतर घट गया था।