प्रस्तावित नियमों में पॉलीएथिलीन (पीई), पॉलीप्रोपिलीन (पीपी), पॉलिएस्टर (पीईटी), पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) तथा किसी भी प्रकार के सिंथेटिक पॉलिमर, को-पॉलिमर और लैमिनेटेड सामग्री के उपयोग पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा एल्युमिनियम फॉयल और मेटलाइज्ड लेयर वाली पैकेजिंग को भी प्रतिबंधित करने की तैयारी है। वर्तमान में पान मसाला उद्योग में बड़े पैमाने पर मल्टी-लेयर प्लास्टिक सैशे का उपयोग होता है, जिन्हें रीसाइकिल करना बेहद कठिन माना जाता है।
मसौदा विनियम में उद्योग को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर टिन और कांच के कंटेनरों के उपयोग की अनुमति दी गई है। यानी कंपनियों को अब प्लास्टिक सैशे की जगह पर्यावरण अनुकूल और पुनर्चक्रण योग्य पैकेजिंग अपनानी पड़ सकती है। इससे उत्पादन लागत और पैकेजिंग ढांचे में बड़े बदलाव की संभावना भी जताई जा रही है।
एफएसएसएआई ने इस संशोधन में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के प्रावधानों को भी शामिल किया है। नियम 4(1)(f) के अनुसार प्लास्टिक सामग्री से बने सैशे का उपयोग गुटखा, तंबाकू और पान मसाला के भंडारण, पैकिंग और बिक्री के लिए नहीं किया जा सकेगा। वहीं नियम में विनाइल एसीटेट-मेलिक एसिड-विनाइल क्लोराइड को-पॉलिमर सहित किसी भी प्रकार की प्लास्टिक सामग्री के उपयोग पर रोक का प्रावधान किया गया है।
अधिसूचना में कहा गया है कि मसौदा नियमों पर 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। तय समय सीमा में प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद अंतिम अधिसूचना जारी की जाएगी। यह कदम सिंगल यूज प्लास्टिक और मल्टी-लेयर पैकेजिंग कचरे को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। हालांकि उद्योग जगत में इस बात को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं कि जब नमकीन, चिप्स, बिस्किट और अन्य खाद्य उत्पाद अब भी बड़े पैमाने पर मल्टी-लेयर प्लास्टिक रैपर में बेचे जा रहे हैं, तब केवल पान मसाला उद्योग पर इतनी कड़ी पाबंदियां लगाने के पीछे क्या तर्क है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पर्यावरण संरक्षण उद्देश्य है तो सभी खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग के लिए समान नीति लागू की जानी चाहिए।