समाजवादी पार्टी अब कांशीराम के जरिए दलित एजेंडे को धार देगी। पार्टी की रणनीति है कि जातीय जनगणना, संविधान रक्षा के साथ कांशीराम के समता और स्वाभिमान के संदेश को भी जन- जन तक पहुंचाया जाएगा। इसकी शुरुआत सोमवार को कांशीराम की मूर्ति के अनावरण समारोह से होगी। यह मूर्ति रायबरेली के दीन शाह गौरा ब्लॉक स्थित मान्यवर कांशीराम महाविद्यालय में लगी है।
समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि सपा के मूल वोटबैंक के साथ दलित वोटबैंक जुड़ जाए तो सियासी वैतरणी आसानी से पार की जा सकती है। इसी रणनीति के तहत सपा ने लोहियावादियों के साथ अंबेडकरवादियों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। बाबा साहब वाहिनी का गठन किया गया। पार्टी के दलित नेता अवधेश प्रसाद को न सिर्फ विधानसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बगल की कुर्सी दी गई बल्कि राष्ट्रीय सम्मेलन में भी वह साथ- साथ नजर आए।
अन्य दलित नेताओं को भी विशेष रूप से तवज्जो दी जा रही है। कांशीराम की प्रयोगशाला से निकले स्वामी प्रसाद मौर्य ही नहीं बल्कि इंद्रजीत सरोज, केके गौतम, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर जैसे नेता सपा की अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं। पार्टी के फ्रंटल संगठन की मान्यता मिलने के बाद बाबा साहब वाहिनी की ओर से पूरे प्रदेश में संविधान बचाओ कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर चलाया जा रहा है। अब सोमवार को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव रायबरेली में कांशीराम की मूर्ति का अनावरण करेंगे।
यह मूर्ति रायबरेली के दीन शाह गौरा ब्लॉक चरूहार जियायक गांव में मान्यवर कांशीराम महाविद्यालय में लगाई गई हैं। इस महाविद्यालय की प्रबंधक सपा एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य की पत्नी शिवा मौर्य हैं। यहां जनसभा भी होगी। इसमें प्रदेशभर के लोग बुलाए गए हैं। सियासी जानकारों का कहनाहै कि बदली परिस्थितियों में अंबेडकरवादी सियासत पर सपा पूरी तरह से काबिज होने की ख्वाहिश रखती है। वह लोहियावादियों, अंबेडकरवादियों को एक मंच पर लाने के बाद अब कांशीराम पर दांव चल रही हैं।
ताकि सपा अपने परंपरागत वोटबैंक (यादव-मुस्लिम) के साथ दलित मतदाताओं को जोड़ सके। वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश सिंह कहते हैं कि अखिलेश यादव को यह अंदाजा लग गया है कि भाजपा को परास्त करने के लिए दलित वोटबैंक को खुद से जोड़ना ही एकमात्र विकल्प है। यही वजह है कि वह दलितों को अपने पाले में करने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। यह प्रयास रंग दिखाया तो प्रदेश ही नहीं देश की सियासत में बड़ा बदलाव होने से इनकार नहीं किया जा सकेगा। क्योंकि इसी रणनीति ने राम लहर में भाजपा को रोका और मुलायम सिंह यादव को सत्ता का सिंहासन सौंपा था।
1993 जैसी लहर फिर पैदा करने की कोशिश
सपा संस्थापक रहे स्व. मुलायम सिंह यादव ने 1991 में इटावा से बसपा संस्थापक स्व. कांशीराम को चुनाव लड़ाया। इस चुनाव में भाजपा ने मुलायम सिंह के सहयोगी राम सिंह शाक्य को मैदान में उतार दिया। कांशीराम को जीत मिली और यहीं से दोनों की दोस्ती गहरी होती चली गई। वर्ष 1993 में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम से दोस्ती कर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली।
गठबंधन ने 176 सीटें के साथ अन्य दलों को जोड़ा और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। लेकिन दो जून 1995 को बसपा ने समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा गठबंधन हुआ। बसपा प्रमुख मायावती ने सभी गिले-शिकवे भूलने की बात करते हुए वोट मांगा।
बसपा को 10 और सपा को पांच सीटें मिलीं। कुछ समय बाद यह गठबंधन टूट गया। विधानसभा चुनाव 2022 से ठीक पहले बसपा ही नहीं बल्कि बसपा पृष्ठभूमि से निकलकर भाजपा में जाने वाले तमाम नेताओं ने सपा का रूख किया। अब कांशीराम की प्रयोगशाला से निकलने वाले ये नेता सपा में रहकर उनके संकल्पों को पूरा करने की दुहाई दे रहे हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद कहते हैं कि संविधान बचाना है तो डा. लोहिया और डा. अंबेडकर के अनुयायियों को एक मंच पर आना होगा।
छह फीट लंबी है मूर्ति
करीब छह फीट लंबी कांशीराम की मूर्ति को पांच फीट ऊंचे चबुतरे पर स्थापित किया गया है। करीब डेढ़ लाख की लागत की यह मूर्ति राजस्थान से बनवाई गई है। मान्यवर कांशीराम महाविद्यालय के बगल में ही बदलू जगन्नाथी इंटर कॉलेज हैं। इसमें सपा के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य के पिता बदलू मौर्य की प्रतिमा लगाई गई है। करीब छह फीट ऊंची इस प्रतिमा का अनावरण भी सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव करेंगे। कार्यक्रम संयोजक उत्कृष्ट मौर्य ने बताया कि दोनों प्रतिमाएं संगमरमर से बनवाई गई हैं। स्थापित करने के लिए अरखा से कारीगर लगाए गए हैं।