यूपी में बेटियों के इलाज में लोग कन्नी काटते हैं। आईसीयू में सिर्फ 30 फीसदी बच्चियां भर्ती होती हैं। जुलाई और अगस्त में एनआईसीयू व पीआईसीयू में भर्ती गंभीर बच्चों में औसतन 30 फीसदी ही बच्चियां थीं।
कानपुर के बिल्हौर में पिंकी (बदला नाम) की छह माह की बेटी की तबीयत खराब हुई। डॉक्टरों ने मस्तिष्क में सूजन (हाइड्रोसिफलस) बताई। बच्ची को लखनऊ के कॉरपोरेट अस्पताल लाया गया। यहां दो दिन भर्ती रखने के बाद परिजनों ने छुट्टी करा ली। दो दिन बाद बच्ची की मौत हो गई।
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पिंकी की बिटिया सिर्फ एक उदाहरण है। प्रदेश में 70 फीसदी बच्चियों को अपने ही माता पिता से महंगे इलाज के मामले में सौतेला व्यवहार झेलना पड़ता है। पीडियाट्रिक इंटेसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) और न्यूनेटल इंटेसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में भर्ती होने वालों में बच्चियों की हिस्सेदारी सिर्फ 30 फीसदी है। यही हाल सामान्य ओपीडी का है।
साफ है कि दौर बदला है, लेकिन बेटी के इलाज पर खर्च करने से बचने की प्रवृत्ति नहीं बदली है। ये हम नहीं बल्कि सरकारी और निजी अस्पताल के आंकड़े कह रहे हैं। अमर उजाला ने पिंकी की बेटी का मामला सामने आने के बाद प्रदेश के सुपर स्पेशियलिटी सरकारी और कॉरपोरेट अस्पतालों के एनआईसीयू व पीआईसीयू का सर्वे किया।
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जुलाई और अगस्त में एनआईसीयू व पीआईसीयू में भर्ती गंभीर बच्चों में औसतन 30 फीसदी ही बच्चियां थीं। निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा 25 फीसदी है, जबकि केजीएमयू, संजय गांधी पीजीआई और लोहिया संस्थान को मिलाकर देखें तो औसत 40 फीसदी है। दूरदराज के जिलों में यह संख्या 20 फीसदी से नीचे चली जाती है।
छुट्टी देने का दबाव
लखनऊ के एक कॉरपोरेट अस्पताल के न्यूनेटोलॉजिस्ट डॉ. आकाश पंडित बताते हैं कि कई बार एक से दो दिन में मामूली सुधार होते ही परिजन छुट्टी करा लेते हैं। हालांकि, हाइड्रोसिफलस जैसी कुछ बीमारियों में 15 से 20 दिन का इलाज चले तो उन्हें बचाया जा सकता है। यही बीमारी जब लड़के को होती है तो उसके उपचार के लिए परिजन किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।
सामाजिक सोच भी बड़ी वजह
भदोही के निजी अस्पताल में आईसीयू विशेषज्ञ डा. सुशीला बताती हैं कि मध्यम और अति पिछड़े वर्ग में बेटियों की अनदेखी आर्थिक के साथ सामाजिक सोच के कारण भी होती है। बच्चियों को आईसीयू में भर्ती करने के नाम पर लोग उसे घर ले जाते हैं, जबकि लड़के को बचाने के लिए मिन्नतें करते हैं।
बच्चियों को अस्पताल में भर्ती करने के लिए कहते ही परिजन खर्च की दुहाई देने लगते हैं। हालांकि, आयुष्मान आने से महिलाओं के इलाज की अनदेखी कम हुई है। अगर ऐसे ही शून्य से 10 साल की बेटियों के उपचार की विशेष योजना आए तो उनके भी इलाज का ग्राफ बढ़ सकता है। जब बेटियां बचेंगी, तभी पढ़ेंगी और फिर आगे बढ़ेंगी। - प्रो. केके यादव, बाल रोग विभाग, लोहिया संस्थान
जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन अभी वक्त लगेगा। कुछ ऐसे मामले भी आते हैं, जिनमें परिवार का कमाऊ व्यक्ति बेटी का इलाज कराना चाहता है, लेकिन बाकी लोग उसका हाथ खींचते हैं। लोग बेटों को बेटियों से ज्यादा जरूरी मानते हैं। मेंटल, फिजिकल डिस्ऑर्डर का ग्राफ देखेंगे तो लिंगानुपात में बड़ा अंतर है, लेकिन धीरे-धीरे यह कम हो रहा है। - प्रो आदर्श त्रिपाठी, मानसिक रोग विभाग, केजीएमयू
फैक्ट फाइल
912 है प्रदेश में बाल लिंगानुपात (0 से 6 वर्ष)
43 है प्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के 1000 बच्चों पर मृत्यु दर अभी
32 है नवजात की मृत्यु दर अभी