नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के जेनेटिक विभाग के प्रो. जसवंत सिंह ने बताया कि देसी नस्लों को चिह्नित करने के लिए नेटवर्क परियोजना पर कार्य चल रहा है। इन नस्लों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा और इनके जेनेटिक पहलुओं का गहन अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि उदाहरण के तौर पर जौनपुरी बकरी के जेनेटिक तत्वों की पहचान कर यह देखा जाएगा कि उसमें इटावा-औरैया क्षेत्र की जमुनापारी नस्ल के साथ क्रॉस ब्रीडिंग का कितना लाभ मिलेगा। पूरी रणनीति का उद्देश्य यह है कि देसी नस्लें भी सुरक्षित रहें और पशुपालकों की आय भी बढ़े। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की जलवायु, चारा, खानपान और उत्पादक क्षमता पर भी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
देसी बकरी: जौनपुरी, जमुनापारी, बरबरी, बुंदेलखंडी आदि।
देसी भेड़- मुजफ्फरनगरी, जालोनी, भदौरी, अवधी आदि।
देसी गाय: गंगातीरी, केनकथा, खेरीगढ़, मेवती, पोनवार, हरियाणा, साहीवाल आदि।
देसी भैंस: भदवारी, तराई, यूपी मुर्रा आदि।
देसी नस्लों को बचाना जरूरी
गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि प्रदेश सरकार नंद बाबा दुग्ध मिशन और मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना के जरिए देसी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दे रही है। सभी कृषि विश्वविद्यालयों, पशु शोध संस्थानों को भी इस दिशा में कार्य करने के लिए निर्देशित किया गया है। देसी नस्लों को बचाना जरूरी है। इस दिशा में हर स्तर पर कार्य हो रहा है।