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UP : राज्य विवि परीक्षा केंद्र निर्धारण में भी कमीशन का खेल, बिना कुछ किए और कहे पहुंचता है सबको अपना हिस्सा

Wed, 02 Nov 2022 04:22 AM IST
दुष्यंत शर्मा अक्षय कुमार, लखनऊ

सार

UP News: राज्य विश्वविद्यालयों में प्री और पोस्ट एग्जाम का काम काली कोठरी के समान है। जहां पर बिना कुछ किए और बिना कुछ कहे पांच से दस फीसदी का कमीशन पहुंचता रहता है। कॉपी-पेपर प्रिंटिंग के साथ-साथ परीक्षा केंद्रों का निर्धारण व उनका आयोजन भी इस खेल का सबसे अहम हिस्सा होता है।
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सांकेतिक तस्वीर...
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विस्तार
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राज्य विश्वविद्यालयों में प्री और पोस्ट एग्जाम का काम काली कोठरी के समान है। जहां पर बिना कुछ किए और बिना कुछ कहे पांच से दस फीसदी का कमीशन पहुंचता रहता है। कॉपी-पेपर प्रिंटिंग के साथ-साथ परीक्षा केंद्रों का निर्धारण व उनका आयोजन भी इस खेल का सबसे अहम हिस्सा होता है। जहां पर बड़े-बड़े प्रभावशाली अधिकारी भी बैक फुट पर आते हैं और नियमों में झोल कर परीक्षा केंद्रों का निर्धारण करते हैं। खास ये कि परीक्षा के दौरान कई केंद्र दागी बताए जाते हैं लेकिन अगली बार वे फिर केंद्र बन जाते हैं।

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राज्य विश्वविद्यालयों, खासकर संबद्धता देने वाले विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या इतनी अधिक होती है कि हर सेमेस्टर में सैकड़ों परीक्षा केंद्र का निर्धारण होता है। कागज पर तो परीक्षा केंद्रों के निर्धारण के नियम बनते हैं। पर भौतिक रूप से उनका सत्यापन नहीं होता है। कई विवि के परीक्षा केंद्रों की दूरी सौ-सौ किलोमीटर दूर तक होती है।

ऐसे में उनका भौतिक सत्यापन और नजर रखना भी नहीं हो पाता है। हाल ही में समाप्त हुई सेमेस्टर परीक्षाओं में लखनऊ के ही एक विश्वविद्यालय के परीक्षा केंद्र पर जब कुलपति खुद निरीक्षण पर पहुंचे तो पता चला कि वहां सीसीटीवी काम ही नहीं कर रहा है। जबकि सीसीटीवी अनिवार्य था और उसकी मॉनिटरिंग कागज पर विश्वविद्यालय ही कर रहा था। 
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इतना ही एक केंद्र में सामूहिक नकल की शिकायत पर कुलपति के निरीक्षण में खामी भी मिली और नकल भी पकड़ी गई लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। कुछ ही घंटे के बाद उनके पास इतने फोन आए कि उन्होंने फाइल बंद कर दी। हालत यह है कि उड़ाका दल केंद्रों पर जाकर नकल पकड़ते भी हैं तो उसकी रिपोर्टिंग नहीं होती है। क्योंकि परीक्षा केंद्रों के निर्धारण से लेकर परीक्षा होने तक की पूरी व्यवस्था का हिस्सा ऊपर तक पहुंचता है। यहां तक की केंद्र बनने में भी आला अधिकारियों का पूरा हस्तक्षेप होता है।

राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं कॉलेज 
राज्य विश्वविद्यालय संबद्ध कॉलेजों की मॉनिटरिंग से लेकर परीक्षा व अन्य सभी चीजों के लिए जिम्मेदार हैं। किंतु अधिकतर जिलों में कई ऐसे कॉलेज राजनीतिक प्रभाव के लोगों के होते हैं कि उन पर विवि प्रशासन हाथ डालने में भी सोचता है। अगर कभी किसी ने कोशिश भी की तो बाद में उस पर इतना दबाव पड़ता है कि वह शांत हो जाता है। कमोबेश यही स्थिति परीक्षा केंद्र बनने की भी है। कई कॉलेज साल दर साल केंद्र बनते हैं और अधिकारी बनने के बाद भी उन्हें कोई बदल नहीं पाता है।

एक व्यक्ति को कई विश्वविद्यालयों का जिम्मा
विश्वविद्यालयों में कॉपी-पेपर प्रिंटिंग से लेकर प्री-पोस्ट एग्जाम का काम इतना बड़ा होता है कि छोटी एजेंसी इसके टेंडर में शामिल नहीं हो पाती हैं। इसकी वजह से जो लोग इसमें शामिल होते हैं, उन्हें टेंडर की शर्तों में बदलाव कर आसानी से काम दिया जाता है। इतना ही नहीं, एक व्यक्ति सिर्फ एक ही नहीं, दो या तीन-तीन विश्वविद्यालयों तक का काम लेता और करता भी है। टेंडर लेने, प्रिंटिंग कराने, मैनपावर सप्लाई करने तक का काम एक ही एजेंसी को कैसे मिल जाता है, यह एक बड़ा सवाल है। इस वजह से गड़बड़ी की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

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