75 लोगों पर किया गया अध्ययन
न केजीएमयू के पीरियोडोंटोलॉजी विभाग ने न रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग और सेंटर फॉर . एडवांस्ड रिसर्च के साथ मिलकर यह अध्ययन किया। इसमें 75 लोगों को शामिल किया गया। इनमें 25 स्वस्थ लोग, 25 क्रॉनिक पीरियोडॉटाइटिस और 25 आईएलडी से पीड़ित मरीज शामिल थे।
केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रोफेसर और लोहिया संस्थान के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि सभी लोगों के मसूड़ों की स्थिति की जांच की गई। इसके लिए प्लाक, मसूड़ों की सूजन, मसूड़ों के पंकिट की गहराई और दांतों से मसूड़ों के जुड़ाव जैसे मानकों को देखा गया। स्वस्थ लोगों की तुलना में दोनों बीमारियों वाले मरीजों में ये मानक ज्यादा खराब मिले।
जानें, क्या होता है इंटरस्टिशियल लंग डिजीज
इंटरस्टिशियल लंग डिजीज फेफड़ों में होने वाली बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के ऊतकों में सूजन आ जाती है और उन पर निशान (स्कारिंग या फाइब्रोसिस) पड़ने लगते हैं। इससे फेफड़े सख्त और भारी हो जाते हैं, जिससे सांस लेने और खून में ऑक्सीजन मिलने में परेशानी होती है। इसकी वजह से मरीज में सांस फूलना, सूखी खांसी आना और बहुत ज्यादा कमजोरी व थकान के लक्षण महसूस होते हैं।
लार और खून में मिले सूजन के संकेत
मरीजों की लार और खून के नमूनों की जांच में एमएमपी-7 और एमएमपी-8 का स्तर अधिक पाया गया। वहीं, टीआईएमपी-1 में कोई खास अंतर नहीं मिला। ये तीनों आपस में जुड़े हुए बायोमार्कर का एक समूह हैं, जो शरीर में एक्स्ट्रासेल्यूलर मैट्रिक्स (कोशिकाओं का बाहरी ढांचा) में गड़बड़ी बताते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया सांस की नली तक पहुंचने और शरीर में सूजन बढ़ने से फेफड़ों पर असर पड़ सकता है।