राज्यसभा में मंगलवार को लोकपाल विधेयक पास हो गया। बुधवार को संभवत: लोकसभा भी इसे पास कर देगी।
लोकपाल के प्रावधानों के अनुरूप राज्यों में भी उसी आधार पर लोकायुक्त कानून बनना है।
यूपी में लोकायुक्त संस्था 1977 से है लेकिन इसके पास न तो कोई जांच एजेंसी है और न भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर छापा मारकर जांच करने का अधिकार।
ऐसे में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की लोकायुक्त की मुहिम बहुत असरदार साबित नहीं हो रही है।
राज्य सरकार भी लोकायुक्त को बहुत ज्यादा अधिकार देने को तैयार नहीं है। ऐसे में यूपी में लोकायुक्त संस्था नख-दंत विहीन होकर रह गई है।
मध्य प्रदेश व कर्नाटक की तरह यूपी में लोकायुक्त को यह अधिकार नहीं है कि किसी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर स्वत: संज्ञान लेकर जांच शुरू कर सके।
यही नहीं, लोकायुक्त के अधीन कोई जांच एजेंसी तक नहीं है। ऐसे में वह अपनी देखरेख में कोई जांच तक नहीं करा सकती।
हालांकि इसके बावजूद पिछले दो-तीन साल में लोकायुक्त भ्रष्टाचारियों में डर पैदा करने में सफल रहे हैं और उनकी रिपोर्ट पर आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को कुर्सी गंवानी पड़ी है।
मौजूदा लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने प्रदेश में लोकायुक्त संस्था को और ज्यादा प्रभावी बनाने तथा भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में त्वरित व प्रभावी कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को मुख्यमंत्री समेत सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को इसकेदायरे में लाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार निरोधक संगठन (एंटी करप्शन ऑर्गनाइजेशन) को इसके अधीन करने का सुझाव दिया था।
भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए लोकायुक्त को छापा मारने, रकम और दस्तावेजों को जब्त करने का अधिकार देने की सिफारिश भी की थी।
लोकायुक्त की ओर से भेजे गए प्रस्ताव में कर्नाटक, केरल व मध्य प्रदेश के लोकायुक्त अधिनियम के प्रावधानों को शामिल करते हुए यूपी के लोकायुक्त अधिनियम में वांछित संशोधन का सुझाव दिया गया था लेकिन सरकार ने इसे नहीं माना।
पिछले विधानसभा चुनाव में लोकायुक्त संगठन को मजबूत करने का वादा करने वाली समाजवादी पार्टी सत्ता संभालते ही अपने वादे से पीछे हट गई।
अखिलेश सरकार ने लोकायुक्त की रिपोर्ट को अहमियत तो दी, लेकिन कई अहम सिफारिशें मानने से हाथ खड़े कर दिए।
पिछले साल दिसंबर में विधानमंडल के दोनों सदनों में लोकायुक्त द्वारा वर्ष 2010 में राज्यपाल को सौंपी गई रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण ज्ञापन सदन के पटल रखा गया।
मायावती सरकार के दौरान लोकायुक्त द्वारा राज्यपाल को सौंपी गई रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्यवाही का ब्यौरा सदन के समक्ष रखकर संकेत दिया कि उनकी सरकार लोकायुक्त को अहमियत दे रही है लेकिन सिफारिशों को लेकर सरकार के ठंडे रुख ने चुनावी वादे पर सवाल खड़ा कर दिया है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत किए गए स्पष्टीकरण ज्ञापन में सिफारिशों के बिंदुवार जवाब से साफ हो हो गया कि सरकार लोकायुक्त के सशक्तीकरण के वादे को पूरा करने से कन्नी काट रही है।
सपा ने अपने घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए न केवल लोकायुक्त संस्था को मजबूत करने की बात कही थी बल्कि उसे बहुसदस्यीय बनाने तथा पुलिस की आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा को उसके नियंत्रण में करने का वादा भी किया था, पर लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट की ज्यादातर सिफारिशों पर अमल करने से राज्य सरकार ने हाथ खड़े कर दिए।
खास तौर पर ग्राम प्रधान, तकनीकी एवं प्राविधिक शिक्षा विद्यालय एवं विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय, चिकित्सा विश्वविद्यालय आदि को लोक आयुक्त के दायरे में लाने से सरकार ने साफ इन्कार कर दिया।