सियासत में जो शख्स या तबका हाशिये पर पड़ा है, वह कब अचानक हॉटकेक बन जाए यह भला कौन जानता है। जिले में निषाद मतदाताओं को देखकर तो यही लगता है। बरसों से भाजपा का वोट बैंक रहे इस समाज में सेंध लगाने के लिए जब सपा ने निषाद प्रत्याशी मैदान में उतारा तो अब इसी वोट बैंक के लिए दोनों दलों में रस्साकशी शुरू हो गई है।
जिले में निषाद मतदाताओं की संख्या करीब दो लाख मानी जाती है। ये पिछले एक दशक से सुल्तानपुर में भाजपा के परंपरागत वोटर बने हुए थे। इसके बावजूद इनकी अहमियत चुनाव में उतनी नहीं आंकी जाती थी। इनकी बजाय ब्राह्मण, क्षत्रिय और मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए ज्यादा प्रयास हुआ करते थे।
पार्टियां इन्हीं तीन के इर्द-गिर्द जीत का ताना-बाना बुनती थीं। किंतु इस बार जब सपा ने पहले भीम निषाद को अपना प्रत्याशी घोषित किया तो अचानक इस समाज की ताकत का लोगों को एहसास हुआ।
करीब आठ महीने तक भीम निषाद अपनी बिरादरी के मतों को साधने में जुटे रहे, लेकिन अंतिम क्षण में सपा ने उनका टिकट काटकर पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद को थमा दिया। अब भाजपा के सामने इस मत को अपनी ओर आकर्षित करने की चुनौती खड़ी हो गई।