आजादी के बाद का दौर परिवारवाद की राजनीति के लिए जाना जाता है। जवाहर लाल नेहरू, मुलायम सिंह यादव, बाल ठाकरे, फारुख अब्दुल्ला, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, प्रेम कुमार धूमल, लालू प्रसाद यादव, बीजू पटनायक, एचडी देवगौड़ा जैसे तमाम बड़े नेता अपने वारिसों को राजनीति में जमाने में सफल रहे।
हालांकि, अब बदले दौर में परिवारवाद को लेकर हर दल में विरोध के स्वर उठने लगे हैं। हर राज्य के बड़े नेता अपने वारिसों को टिकट दिलाने की जुगत में नजर आते हैं। वहीं, विरासत में सियासत अगर मिल भी जाए तो आगे की राह पहले की तरह आसान नहीं रही।
राजनाथ और कलराज के बेटों का भी इंतजार जारी
प्रदेश की राजनीति में ऐसे तमाम चेहरे हैं, जो अपने वारिसों का सियासी ठौर तलाश रहे हैं। हालिया लोकसभा चुनाव में भी ऐसे चेहरों पर सबकी नजरें हैं। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह बीते कई साल से राजनीति में हाथ तो आजमा रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई बड़ा ओहदा या चुनाव में पार्टी का टिकट नसीब नहीं हुआ है।
हालांकि, बड़े बेटे पंकज भाजपा विधायक हैं। राजस्थान के राज्यपाल एवं वरिष्ठ भाजपा नेता कलराज मिश्र भी अपने बेट अमित को राजनीति में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने भी अपने बेटे कपिल को राजनीति में लाने के तमाम जतन किए, लेकिन अब भी संघर्ष जारी है।
भाजपा से सपा में जाने और फिर अपनी अलग पार्टी बनाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की कवायद को उनके बेटे उत्कृष्ट के टिकट से जोड़ा जाता है। उन्होंने बेटे के लिए हर पार्टी का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि, उनकी बेटी संघमित्रा बदायूं की सांसद हैं। पर, भाजपा ने इस बार उनका टिकट काट दिया है।
राजभर, निषाद और बृजभूषण फायदे में
प्रदेश सरकार में मंत्री ओपी राजभर ने अपने बेटे अरविंद राजभर को घोसी से प्रत्याशी बनाया है। मंत्री संजय निषाद ने भी अपने एक बेटे को सांसद, दूसरे को विधायक बनवा चुके हैं। सांसद बृजभूषण सिंह भी अपने बेटे प्रतीक भूषण को राजनीति में स्थापित कर चुके हैं।
- रायबरेली सदर से विधायक रहे बाहुबली अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह भी सफल रहीं।
- पूर्व मंत्री नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल भी अपने पिता की विरासत को बखूबी संभाल रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह सांसद हैं तो पौत्र संदीप सिंह प्रदेश में मंत्री है
पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं के परिवार की चमक फीकी
पूर्वांचल में पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी और अमरमणि त्रिपाठी का नाम सबसे पहले आता है। हरिशंकर तिवारी के बाद उनके कुनबे के कई सदस्यों ने सियासत में कदम रखा, लेकिन सितारे गर्दिश में ही रहे। बैंक घोटाले में पूरा कुनबा फंसा है। वहीं, अमरमणि के बेटे अमनमणि एक बार विधायक बनने में सफल रहे, इसके बाद उन्हें निराशा हाथ लगी।