पूछताछ में यह भी पता चला कि नामचीन कंपनियां दवा डिपो और थोक कारोबारियों को निर्धारित मूल्य पर करीब 10 फीसदी लाभ देती हैं जबकि खुदरा विक्रेता को 15 से 20 फीसदी तक लाभ मिलता है। यदि खुदरा विक्रेता 10 फीसदी की छूट दे दे तो भी उसे ज्यादातर दवाओं में प्रति पत्ता (10 से 15 टैबलेट) करीब 10 फीसदी तक लाभ मिल जाता है।
वहीं, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड से आ रही नकली दवाओं में डिपो का कोई खेल ही नहीं है। ये दवाएं सीधे निर्माण स्थल से नामचीन कंपनी के रैपर में विभिन्न शहरों के गोपनीय गोदामों तक पहुंचती हैं। वहां से छोटी-छोटी बाजारों के मेडिकल स्टोरों पर पहुंचाई जाती हैं। मेडिकल स्टोर संचालक को असली दवा खरीदने पर पक्का बिल मिलता है और उसे तत्काल उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इसके विपरीत नकली दवाएं बिना कीमत चुकाए ही मिलती हैं। मेडिकल स्टोर संचालक दवाओं को बेचने के बाद अगले माह खेप लेकर आने वाले कर्मचारी को भुगतान करता है। दवा के रैपर पर प्रिंट मूल्य 100 रुपये है तो मेडिकल स्टोर संचालक को 10 रुपये में ही उपलब्ध कराया जाता है।
एफएसडीए आयुक्त डॉ. रोशन जैकब का कहना है कि नकली दवाओं का नेटवर्क खत्म करने के लिए हर जिले में जांच चल रही है। दुकानदारों से अपील है कि बिना पक्के बिल के न दवा बेचें और न ही खरीदें। जांच में मेडिकल स्टोर पर बिना बिल की दवा मिली तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।