सरोगेसी का सहारा लेने की सलाह दी
अदालत लखनऊ के एक दंपत्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनकी शादी को 17 साल से अधिक हो चुके थे, लेकिन प्रजनन उपचार कराने के बावजूद वे स्वाभाविक रूप से गर्भधारण नहीं कर पा रहे थे। भ्रूण स्थानांतरण के कई प्रयास भी विफल रहे। जिसके बाद चिकित्सकों ने उन्हें सरोगेसी का सहारा लेने की सलाह दी।
इसके बाद दंपति ने 18 जुलाई, 2015 को तीन भ्रूणों को संरक्षित कराया। हालांकि, जब उन्होंने सरोगेसी की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की, तब तक पत्नी 50 वर्ष की वैधानिक ऊपरी आयु सीमा को पार कर चुकी थी।इसलिए, उन्होंने आयु प्रतिबंध के बावजूद परोपकारी सरोगेसी की अनुमति प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया।
वैधानिक आयु प्रतिबंध लागू नहीं होता
खंडपीठ ने अरुण मुथुवेल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी उल्लेख किया, जहां सरोगेसी अधिनियम के लागू होने से पहले भ्रूणों को फ्रीज कराने वाले एक इच्छुक दंपति को राहत दी गई थी। कई नजीरों का हवाला देकर हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं पर वैधानिक आयु प्रतिबंध लागू नहीं होता है।
इस प्रकार, कोर्ट ने दंपति को सरोगेसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और अधिनियम की धारा 35 के तहत तीन सप्ताह के भीतर उपयुक्त प्राधिकारी या मुख्य चिकित्सा अधिकारी, लखनऊ को आवेदन करने की अनुमति दी।कोर्ट ने प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह उनकी बात सुने और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और अधिनियम के प्रावधानों पर विचार करने के बाद तर्कसंगत आदेश पारित करे।