इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि सरकारी संस्थानों में सब्सिडी पर पीजी मेडिकल पढ़ाई करने वाले डॉक्टर अनिवार्य सेवा बॉन्ड से बच नहीं सकते। प्रशासनिक देरी से बॉन्ड समाप्त नहीं होता। अदालत ने दो साल की सरकारी सेवा की शर्त को बरकरार रखते हुए संबंधित डॉक्टर की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सरकारी मेडिकल संस्थानों में रियायती दरों (सब्सिडी) पर पोस्टग्रेजुएट मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने वाले डॉक्टरों की सेवा को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि वे अपनी दाखिले के समय की गई दो साल की अनिवार्य सेवा बॉन्ड की शर्त से बच नहीं सकते।
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अदालत ने कहा कि पोस्टिंग की पुष्टि करने में प्रशासनिक देरी होने का मतलब यह नहीं है कि डॉक्टर की यह जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी लखनऊ के एस जी पी जी आई से एम डी करने वाली डा. अपारूपा सेन गुप्ता की याचिका पर दिए फैसले में की है। कोर्ट ने कहा कि अनिवार्य सरकारी सेवा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर उपलब्ध रहें।
कोर्ट ने कहा कि किसी तय सीमा के भीतर पोस्टिंग ऑर्डर जारी करने में प्रशासन से हुई कोई चूक, दाखिले की शर्त के रूप में भरे गए बॉन्ड को अपने आप रद्द नहीं मान सकती। याची डा गुप्ता ने लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एस जी पी जी आई) से ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में एम डी की पढ़ाई पूरी की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कोर्स पूरा होने के तीन महीने के भीतर सरकार द्वारा पोस्टिंग देने में विफल रहने के कारण उनके बॉन्ड को रद्द माना जाना चाहिए, जिसे अदालत ने नामंजूर करके खारिज कर दिया।