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मुस्लिम वोट बैंक और कोर्ट के फैसले पर फंसी सरकार

Sat, 13 Dec 2014 01:22 AM IST
शोभित श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
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प्रदेश सरकार विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर मुसलमानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती है। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद उसने विवाह पंजीकरण अनिवार्य करने वाले प्रस्ताव को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
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राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, केरल व बिहार समेत कई राज्यों में शादी का पंजीकरण पहले से अनिवार्य है। वहां पंजीकरण न कराने वालों से जुर्माना भी वसूला जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह अभी तक लागू नहीं हो सका है।

लोकसभा चुनाव से पहले भी इसे अनिवार्य करने की कोशिश हुई थी, लेकिन चुनावी वर्ष के चलते सरकार ने इसे लागू नहीं किया। अगर प्रदेश में यह नियम लागू हुआ तो सभी समुदायों के लिए विवाह का पंजीकरण कराना जरूरी होगा। पंजीकरण न कराने वालों को दंडित करने का प्रावधान भी रखा जाएगा।
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दरअसल, विवाह पंजीकरण में सबसे ज्यादा दिक्कत मुस्लिम समुदाय को है। वे इसे शरीयत कानून में दखल मानते हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं का मानना है कि पंजीकरण न कराने पर भला निकाह को कैसे अवैध करार दिया जा सकता है। शरीयत कोर्ट ही निकाह को वैध या अवैध करार दे सकती है।

पंजीकरण नहीं कराने पर योजनाओं से होंगे वंचित

इन्हीं पचड़ों को देखते हुए महिला कल्याण विभाग ने ऐसी तरकीब अपनाई जिससे विवाह पंजीकरण अनिवार्य भी हो जाए और मुसलमानों की नाराजगी भी न झेलनी पड़े।

इसलिए विभाग ने पंजीकरण न कराने वालों पर फिलहाल किसी दंड का प्रावधान अपनी नियमावली में नहीं रखा। नियमों में बस यह जोड़ा गया कि जो भी नवविवाहित जोड़े विवाह पंजीकरण नहीं कराएंगे, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिया जाएगा।

कैबिनेट बैठक में मुस्लिम मंत्रियों ने किया विरोध
पिछले छह दिसंबर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में जब यह प्रस्ताव रख गया तो इसका विरोध मुस्लिम मंत्रियों ने ही कर दिया।

उनका कहना था कि पहले इस नियमावली को विस्तार से पढ़ने का समय दिया जाए, इसके बाद ही कोई निर्णय किया जाए।

हालांकि, नियमावली को कैबिनेट में लाने से पहले मुख्यमंत्री इस पर सहमति दे चुके थे, लेकिन मंत्रियों का रुख देखकर उन्होंने भी इस पर अपना कोई पक्ष नहीं रखा, जिससे यह प्रस्ताव पास नहीं हो पाया।
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15 को सुप्रीम कोर्ट में देना है जवाब

विवाह पंजीकरण अनिवार्य करने के लिए प्रदेश सरकार पर सुप्रीम कोर्ट का दबाव है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2006 में राज्यों को विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता के निर्देश दिए थे।

इस मुद्दे पर वह लगातार राज्यों की मॉनिटरिंग कर रहा है। प्रदेश सरकार हर बार शपथ पत्र देकर प्रक्रिया जारी रहने की बात कहती रही है।

15 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय में फिर इस मसले पर सुनवाई होनी है, जिसमें यूपी को जवाब देना है कि उसने अभी तक विवाह पंजीकरण का नियम लागू क्यों नहीं किया।

अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखने के लिए कोई ठोस जवाब सूझ नहीं रहा है। इसको लेकर वे काफी परेशान हैं।
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