काली कमाई से कुबेर बने नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह को सीबीआई जांच से बचाने की सरकार की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है। यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सरकार एसएलपी दायर करने की तैयारी ही करती रही और सीबीआई एक्शन में आ गई।
यादव सिंह को बचाने के लिए सरकार हरीश साल्वे, कपिल सिब्बल, राकेश द्विवेदी और दिनेश द्विवेदी जैसे दिग्गज वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए लगाने जा रही थी। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड रवि प्रकाश मेहरोत्रा को एसएलपी दायर करने का पत्र भी भेज दिया गया था लेकिन इसी बीच यादव सिंह पर सीबीआई का शिकंजा कस गया।
यही नहीं सीबीआई जांच संबंधी हाईकोर्ट के आदेश के बाद यादव सिंह की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित जस्टिस एएन वर्मा आयोग भी सक्रिय हो गया है लेकिन सीबीआई के एक्शन के बाद आयोग के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो रहा है।
16 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया था। जानकार बताते हैं कि सीबीआई जांच से न सिर्फ यादव सिंह की काली कमाई से जुड़े आरोपों का सच सामने आ सकता है बल्कि सियासत व नौकरशाही से जुड़े कई चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं।
भ्रष्ट को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का लिया फैसला
इसी के चलते काफी मंथन के बाद सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपी इंजीनियर को सीबीआई जांच से बचाने के अपयश की परवाह किए बिना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में अपील करने का फैसला करके सुप्रीमकोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को महाधिवक्ता व न्याय विभाग के राय की जानकारी देते हुए अपील का पत्र भेज दिया।
एसएलपी दायर हो पाती इससे पहले ही सीबीआई ने बाकायदा मुकदमा दर्ज करके यादव सिंह पर फंदा डाल दिया। दरअसल, सरकार ने कानूनी जानकारों से राय-सलाह करने के बाद सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया था। कुछ कानूनी विशेषज्ञों की राय थी कि मामले की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग की जांच जारी रहने के बावजूद सीबीआई जांच के आदेश तर्कसंगत नहीं है और इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल सकती है।
हालांकि कुछ कानूनी जानकारों की राय यह भी थी कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई जांच कराने के लिए जो तथ्य दिए हैं, उससे सुप्रीम कोर्ट में राह बहुत आसान नहीं होगी लेकिन सरकार यादव सिंह को बचाने के लिए अपने इस अंतिम दांव को भी आजमा लेना चाहती थी। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट में तगड़ी पैरवी की भी तैयारी थी।
महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजकर इस मामले में दिग्गज वकील हरीश साल्वे, कपिल सिब्बल, राकेश द्विवेदी व दिनेश द्विवेदी का सहयोग लेने का सुझाव भी दिया था।
सीबीआई की सक्रियता के पीछे राजनीतिक दांवपेंच भी
यादव सिंह प्रकरण में सीबीआई के एकाएक सक्रिय होने के पीछे राजनीतिक कारण भी माने जा रहे हैं। कांग्रेस संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रही है। दूसरे विपक्षी दलों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस के सुर में सुर मिला रही और केंद्र सरकार के विरोध में उसके पीछे खड़ी है।
केंद्र सरकार सीबीआई के जरिये समाजवादी पार्टी को काबू में रखने की रणनीति पर काम कर रही है। मंगलवार को यादव सिंह के ठिकानों पर की गई ताबड़तोड़ छापामारी को केंद्र के इशारे पर की गई कार्रवाई भी माना जा रहा है।
दरअसल, यादव सिंह के जितने अच्छे संबंध बसपा के बड़े नेताओं से हैं उतने ही सपा के भी कई दिग्गज नेताओं से हैं। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद निलंबन समाप्त कराकर उसकी नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर पद पर तैनाती कराने में सत्तारूढ़ दल के एक बड़े नेता की अहम भूमिका रही है।
सरकार की छटपटाहट यह है कि सीबीआई जांच से कई सफेदपोश और नौकरशाहों के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में उसके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।