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महिला कॉलेज पर गिरी राज्यपाल की गाज, प्रबंधन भंग

Thu, 18 Aug 2016 05:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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राज्यपाल राम नाईक - फोटो : amar ujala
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शिक्षिकाओं को देय लाभ से वंचित करने, उनका मानसिक व आर्थिक उत्पीड़न करने जैसे आरोपों से घिरे महिला विद्यालय डिग्री कॉलेज के प्रबंध तंत्र पर आखिर राजभवन की गाज गिर ही गई।
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राज्यपाल की स्वीकृति के बाद शासन ने कॉलेज के प्रबंधतंत्र को अपवर्जित कर जिलाधिकारी को अगले एक साल के लिए कंट्रोलर नियुक्त किया है। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा जितेंद्र कुमार की ओर से मंगलवार को इस संबंध में पत्र जारी कर दिया गया है।

मालूम हो कि महिला कॉलेज प्रबंध तंत्र के खिलाफ लंबे समय से यहां की शिक्षिकाएं और लविवि सहयुक्त महाविद्यालय शिक्षक संघ ने मोर्चा खोला हुआ था।

कॉलेज का प्रबंध तंत्र भंग किए जाने पर लविवि सहयुक्त महाविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) ने हर्ष व्यक्त किया है, लेकिन संगठन के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय ने कहा कि जब तक कॉलेज के अध्यक्ष और प्रबंधक की गिरफ्तारी नहीं होती उनका आंदोलन जारी रहेगा। वहीं, डीएम राजशेखर ने कहा कि ऑर्डर मिलने के बाद सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, जिससे कॉलेज की स्थिति सुधरे।
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शिक्षिकाओं को किया मानसिक व आर्थिक शोषण

- फोटो : amar ujala
निदेशक उच्च शिक्षा ने बीती दो मार्च को शासन को पत्र भेजकर अवगत कराया कि महिला कॉलेज में शिक्षिकाओं का उत्पीड़न किया जा रहा है।

प्रमुख सचिव के पत्र के अनुसार शासन, निदेशक और क्षेत्रीय उच्च शिक्षाधिकारी की ओर से इस संबंध में कई बार कॉलेज प्रबंध तंत्र को निर्देश देने के बाद भी उनकी अवहेलना की जाती रही।

कॉलेज में शारीरिक शिक्षा की प्रवक्ता एना सिंह को प्रबंध तंत्र ने परिनियमावली के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर उन्हें सत्रांत लाभ नहीं दिया और उन्हें शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की तरह सेवानिवृत्त कर दिया। उनकी पेंशन, जीपीएफ व अन्य देयकों का प्रकरण अब तक लंबित है।

विवि परिनियमावली के अनुसार ऐसे मामले में निदेशक निर्णय अंतिम मान्य होता है, जिसकी अवहेलना हुई। वहीं, संस्थान के वित्तीय वर्ष 2011-12 और 2013-14 की सम्परीक्षा में स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग ने गंभीर वित्तीय अनियमितताएं पकड़ी थीं।
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रंग लाया डॉ. सुप्रभा का संघर्ष

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कॉलेज में वैसे तो शिक्षिकाओं का उत्पीड़न काफी समय से चल रहा था। लेकिन, इसके खिलाफ खुलकर प्राचार्य स्व. डॉ. सुप्रभा वी सहाय ने मोर्चा खोला था। उन्होंने ही कॉलेज की वित्तीय अनियमितताओं को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई। कॉलेज प्रबंध तंत्र ने बिना एलयू कुलपति का अनुमोदन लिए ही प्रबंध समिति की बैठक कर बीती सात फरवरी को प्रस्ताव पारित कर डॉ. सुप्रभा की बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया था।

कुलपति प्रो. एसबी निमसे ने जब 10 फरवरी को इस पर स्थगनादेश जारी किया तो भी कॉलेज प्रबंधन ने डॉ. सुप्रभा को उनका कमरा तक नहीं दिया, बल्कि उनके साथ एक अन्य शिक्षिका को प्राचार्य का कार्यभार भी दिए रखा। लेकिन, डॉ. सुप्रभा ने हार नहीं मानी और लुआक्टा के पदाधिकारियों साथ मिलकर जंग जारी रखी।

बीती 24 जून को कुलपति ने उनके टर्मिनेशन को निरस्त कर दिया। हाल ही में आठ अगस्त को जब डॉ. सुप्रभा का हृदयघात से निधन हुआ तो उनके परिजनों ने कहा कि कॉलेज प्रबंध तंत्र द्वारा मानसिक प्रताड़ना के चलते ही ऐसा हुआ है।

डॉ. सुप्रभा और महिला कॉलेज प्रबंधन की लड़ाई 2004 से ही चल रही थी। एक मई, 2004 में डॉ. सुप्रभा की नियुक्ति प्राचार्य पद पर हुई। लेकिन 10 अप्रैल, 2005 को एक वर्ष पूरा होने से पहले ही कॉलेज प्रबंधन ने मनमानी करते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।

इसके खिलाफ वह उच्च न्यायालय से केस जीती तो कॉलेज प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। लेकिन वहां भी डॉ. सुप्रभा ने मजबूती से अपना पक्ष रखा और 10 साल की लड़ाई के बाद आखिरकार 10 फरवरी, 2015 में उन्हें फिर से प्राचार्या का पद मिल गया।
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