‘राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर प्रदेश में भेजा जाता है। वह आंख, कान, मुंह बंद रखने वाला नहीं, बल्कि यह देखने वाला होता है कि प्रदेश में सारा काम संविधान की दृष्टि से किया जा रहा है या नहीं। मैं अपना काम संविधान में तय प्रक्रिया के तहत ही करता हूं। इस दौरान कई बातों पर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं।’
राज्यपाल राम नाईक ने अपनी भूमिका के बारे में प्रदेश के वकीलों और कई मौजूदा व पूर्व जजों के सामने इन शब्दों में अपनी बात रखी। वह हाल ही में उठे संवैधानिक मुद्दों पर खुल कर बोले। मौका था शनिवार को अधिवक्ता परिषद द्वारा राजधानी में आयोजित अधिवेशन का।
राज्यपाल ने विधान परिषद के 9 सदस्यों के मनोनयन में फाइल रोकने के प्रकरण पर कहा, अब तक यह परंपरा रही है कि राज्यपाल के पास फाइलें आती थीं और पास करके लौटा दी जाती थीं। परंपराओं का सम्मान करना अच्छी बात है, लेकिन जब वे कानून और संविधान के आड़े आ जाएं तो उस पर गौर करना चाहिए।
नाईक ने दूसरा विषय लोकायुक्त की नियुक्ति का उठाया और बताया कि यह कोई गोपनीय प्रक्रिया नहीं है। अधिनियम के अनुसार छह वर्ष के लिए लोकायुक्त नियुक्त होने चाहिए, संशोधन कर इस अवधि को आठ वर्ष किया गया। साथ ही नियम जोड़ा गया कि अगली नियुक्ति तक पूर्व नियुक्ति बनी रहेगी।