उन्होंने कहा कि पिता को सोचना होगा कि ऐसी बेटी अगर गर्भधारण करेगी तो क्या उसका बच्चा स्वस्थ पैदा होगा। क्या वह ऐसी स्थिति में होगी कि वह अपने बच्चे को पर्याप्त मात्रा में दूध पिला सके। ऐसी बेटी कुपोषित बच्चे को ही जन्म देगी।
आगे कहा कि बेटी के प्रति सोच में पिता को बदलाव लाना होगा। मां के दूध का बच्चे के मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। मां के दूध में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। यह शिशु को मजबूत बनाने के साथ बीमारियों से बचाव भी करता है। नवजात शिशुओं की माताओं को स्तनपान व्यवहार के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। उन्होंने माताओं को आह्वान किया कि वे जन्म के एक घंटे के अन्दर माँ अपना दूध निश्चित रूप से बच्चे को पिलाये तथा अपने फिगर पर ध्यान न दें।
उन्होंने माताओं से कहा कि प्रसव के बाद पहला घंटा बच्चे के स्तनपान के लिये अत्यन्त जरूरी है। पहले छह माह तक मां केवल अपना ही दूध पिलाए और इसके बाद ही घर का बना अनुपूरक आहार दे। इससे बच्चा तेजी से बढ़ता है। मां को चाहिए कि वह दो वर्ष तक निरंतर बच्चे को अपना दूध पिलाती रहे। राज्यपाल ने कहा कि केंद्र सरकार की घोषित नई शिक्षा नीति में भी ऐसे विषयों को शामिल किया गया है। शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जाना चाहिए।
राज्यपाल ने आगे कहा स्तनपान की जागरूकता के लिए यह जरूरी है कि सभी विभाग एक मंच पर आकर संयुक्त रूप से प्रयास करें। इसमें ग्रामीण व शहरी क्षेत्र की महिलाओं, बच्चों, स्वयं सहायता समूह आदि को भी जोड़े। प्रधानमंत्री के फिट इंडिया कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें केवल योग एवं खेल ही नहीं बल्कि पौष्टिक आहार व व्यवहार भी शामिल है।
इस मौके पर एसजीपीजीआई की डॉ. पियाली भट्टाचार्या, महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाती सिंह, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अतुल गर्ग, अपर मुख्य सचिव राज्यपाल महेश कुमार गुप्ता, अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं परिवार कल्याण अमित मोहन प्रसाद, अपर मुख्य सचिव महिला एवं बाल विकास राधा एस चौहान, सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य व मिशन निदेशक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अपर्णा उपाध्याय, महानिदेशक परिवार कल्याण डॉ. मिथलेश चतुर्वेदी आदि मौजूद थीं।