'हमारे देश में ज्यादातर बजट एलोकेशन होने को ही ज्यादा संतोषजनक माना जाता है। ताली बज जाती है, वह एलोकेट हो गया। आउटले की तरफ देखने वाली संख्या बहुत कम है, आउटपुट पर देखने वाली संख्या उससे भी कम है और आउटकम की तो चर्चा ही नहीं होती थी। हमने पूरा वर्क कल्चर ऐसा बना दिया।
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इस सरकार ने आग्रह रखा है कि पार्लियामेंट में आउटकम रिपोर्ट्स रखते हैं, ताकि पता चल सके कि जिस काम के लिए रुपया निकला था, वह उसी काम में गया कि नहीं? इसीलिए हमारा प्रयास आउटकम पर बल देने की दिशा में रहना चाहिए।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें बीती 7 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में कहीं थीं। पर, यूपी के संदर्भ में यह पूरी तरह खरी उतरती है।
प्रदेश के आय-व्ययक में न तो ‘आउटकम बजट’ और ‘ऑफ बजट’ की कोई व्यवस्था है और न ही लोगों को सहज ही आकर्षित करने वाले ‘जेंडर बजट’ या समन्वित ‘कृषि बजट’ जैसी पहल नजर आती है। किसी ने इस तरह के सुझाव दिए भी तो वह रद्दी की टोकरी में चला गया।
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योगी सरकार ने अपनाया ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’
योगी आदित्यनाथ
बजट एक्सपर्ट बताते हैं कि आउटकम का ब्योरा न होने से बजट आवंटन के बाद पुनर्विनियोग में आसानी होती है। विधायिका से बजट किसी काम के लिए देकर वाहवाही लूटी जाती है, बाद में रकम तय काम की जगह दूसरे काम के लिए ट्रांसफर (पुनर्विनियोग) करा दी जाती है। यूपी में यह खेल बजट पारित होने के बाद से ही शुरू हो जाता है।
हालांकि, योगी सरकार ने केंद्र की ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’ को अपनाने की पहल की है। बजट प्रस्तावों को बजट पेश करने के 15-20 दिन पहले की जगह, केंद्र की तरह उसी दिन कैबिनेट से मंजूरी देने की पहल कर दी है। जानकार बताते हैं कि सरकार आगे के बजट में प्रधानमंत्री मोदी के आउटकम बजट व अन्य इनोवेटिव पहल का साहस दिखा सकती है।
अफसरशाही को इसलिए रास नहीं आता ‘आउटकम बजट’
जानकर बताते हैं कि ‘आउटकम बजट’ होने से आम लोगों को आसानी से पता चल सकेगा कि पिछले बजट में सरकार ने जिस मद में जो पैसा दिया, वह उसी में खर्च हुआ या किसी अन्य में ट्रांसफर कर दिया गया।
दूसरा, उस पैसे का कितना उपयोग हुआ? तीसरी, उसकी भौतिक प्रगति कितनी हुई? या जिस लक्ष्य के लिए बजट दिया गया, वह कितना हासिल हुआ? इससे अफसरशाही और प्रशासनिक मशीनरी की विधायिका के प्रति जवाबदेही भी तय होगी। शायद इसी वजह से अफसरशाही को बजट में ऐसी पहल रास नहीं आती है।
मध्य प्रदेश तो ‘आउटकम’ के साथ ‘जेंडर’ बजट भी लाता है
एमपी के सीएम शिवराज सिंह चौहान
- फोटो : अमर उजाला
पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश बजट में प्रयोगों को लेकर कई मायने में काफी आगे है। मध्य प्रदेश सरकार न सिर्फ आउटकम बजट अलग से रखती है, बल्कि जेंडर बजट व कृषि बजट भी अलग से लाती है।
जेंडर बजट में विभागवार बताया जाता है कि कौन-सा विभाग में महिलाओं के लिए क्या-क्या योजनाएं ला रहा है? उसके लिए कितना आवंटन किया गया? बजट में महिलाओं को कितनी हिस्सेदारी मिली, जैसी जानकारी भी जेंडर बजट से मिल जाती है।
इसके अलावा कृषि बजट में न सिर्फ कृषि, बल्कि उससे जुड़े सभी विभागों की योजनाओं का ब्योरा होता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले यूपी में इस ओर भी कोई पहल नहीं हुई है। अलग कृषि बजट लाने से किसानों पर फोकस बढ़ सकता है।
बजट आम लोगों के लिए लाया जाता है, लेकिन यूपी में इसमें आम लोगों की कोई भूमिका नहीं होती। वहीं, उड़ीसा में नवीन पटनायक सरकार हर आम बजट के पहले उड़ीसा बजट की वेबसाइट पर आम लोगों से सुझाव आमंत्रित करती है। लोग ई-मेल, व्हाट्सएप, टेलीग्राम व एसएमएस के जरिए भी सुझाव देते हैं। यूपी में आम लोगों से सुझाव लेने जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। शायद यही वजह है कि यहां आम आदमी बजट से खुद को नहीं जोड़ पाता है।
आउटकम बजट से आती है पारदर्शिता
अर्थशास्त्री डॉ. अरविंद मोहन बताते हैं कि आउटकम बजट जवाबदेही बढ़ाता है। इससे पता चल सकता है कि जो बजट जिस लक्ष्य को लेकर दिया गया, उसका कितना फायदा सामने आ रहा है। लक्ष्य हासिल करने में कोई कमी है तो उसे सुधारने का मौका होता है। कम बजट में बेहतर नतीजे आ सकते हैं।
इसके अलावा जेंडर बजट जैसे प्रयोग से महिलाओं के हित पर फोकस बढ़ता है। इन पहल को बजट में शामिल करना चाहिए। इसके अलावा बजट निर्माण में आम लोगों के सुझाव लिए जाने चाहिए। इससे आम व्यक्ति बजट से जुड़ाव महसूस करेगा। इससे सरकार को ही फायदा होगा।