लोहिया संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विक्रम सिंह का कहना है कि हर व्यक्ति के शरीर की क्षमता अलग-अलग होती है। दवा लिखते वक्त मरीज की स्थिति, वजन आदि का ध्यान रखा जाता है। अधिक मात्रा होने से शरीर में आक्सीजन की मांग और आपूर्ति का संतुलन गड़बड़ा जाता है। धड़कन बढ़ जाती है। हार्ट अटैक का खतरा रहता है। दिमाग की नशें भी प्रभावित होती हैं।
लोहिया संस्थान के गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रीतम दास का कहना है कि कोडिन सिरप एवं नशे के लिए दवा देने वाले मात्रा का ध्यान नहीं रखते हैं। 50 मिलीलीटर से नशा नहीं हुआ तो 100 मिलीलीटर ले लेते हैं। इसी तरह नशे के लिए एक टैबलेट के बजाय दो टैबलेट ले लेते हैं। इससे लिवर खराब होता है और फिर किडनी व शरीर के दूसरे अंग भी जवाब देने लगता है।
क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. सुशीला यादव का कहना है कि नारकोटिक्स दवाएं कैंसर के गंभीर मरीजों को दर्द कम करने के लिए दी जाती हैं। इसके अलावा नींद की समस्या और मिर्गी जैसी दिक्कतों में भी डॉक्टर ये दवाएं लिखते हैं। अधिक डोज लेने से नशा होता है। नशा करने वाले धीरे धीरे जोड़ बढ़ाते जाते हैं, जिससे उनके विभिन्न अंगों को नुकसान पहुंचता है। ऐसे मरीजों का उपचार शुरू होता है तो लंबे समय तक आईसीयू में रखना पड़ता है।
फार्मासिस्ट फेडरेशन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष सुनील यादव का कहना है कि फार्मास्यूटिकल्स में कोडिन, ट्रामाडोल, फेंसिडिल को नशे के कारोबार में अहम माना गया है। खास बात यह है कि लखनऊ में पकड़ी दवाओं में फेंसिडिल कफ सिरप है। ये दवाएं बिना पर्चे के नहीं दी जाती हैं। इनकी खरीद और बिक्री का पर्चा रखना भी जरूरी है।