प्रदेश में बारिश और कीटों से आम की फसल बचाने के लिए बागवान बैगिंग तकनीक अपना रहे हैं। इसमें फलों को विशेष कागज या थैले से ढककर सुरक्षित किया जाता है। इससे आम चमकदार, टिकाऊ और बेहतर गुणवत्ता का होता है। किसानों को अधिक कीमत मिल रही है, जबकि उद्यान विभाग अनुदान देकर इस तकनीक को बढ़ावा दे रहा है।
प्रदेश में आंधी- बारिश और कीटों की मार के बाद बागों में बची 40 से 50 फीसदी आम की फसल को सुरिक्षत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए बैगिंग प्रणाली पर जोर दिया जा रहा है, ताकि आम की भरपूर कीमत मिल सके। किसानों को बेहतर फायदा देने के लिए उद्यान विभाग के कर्मचारी उन्हें बैग बांधने के तरीके बता रहे हैं।
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आम की स्थिति जानने के लिए हम शुक्रवार सुबह काकोरी के रास्ते सहिलामऊ पहुंचे। यहां एक बाग में मिले शंकर सिंह आसमान की तरफ देखकर कहते हैं कि ये बादल और टिप टिप गिरती बूंदें आम के लिए जहर जैसी हैं।
बैग ( कागज, पालीथीन थैला) को दिखाकर कहते हैं कि इससे कुछ उम्मीद है। वह थैला बांधने में लगे मजदूरों को समझाते हैं कि सिर्फ लंगड़ा और चौसा में ही बांधना है। दशहरी को उसके हाल पर छोड़ दो।
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ताकीद भी करते हैं कि जो फल मजबूत दिख रहा है सिर्फ उसी में बांधना है। यहां से आगे बढ़े तो कनार गांव की बाग में उद्यान विभाग के कर्मचारी मिले। वे किसानों को बैग बांधने का तरीका सिखा रहे थे।
बस्ती के बागवान संदीप मौर्य बताते हैं कि पिछले वर्ष तीन हजार फलों में बैग बंधवाया था। सामान्य आम 20 से 25 रुपये प्रति किलो तो बैग वाला 35 से 45 रुपये किलो बिका था। यह आम ज्यादा बड़ा, चमकदार और टिकाऊ था।
फलों को तोड़ने के बाद सुरक्षित रखे गए बैग इस बार भी इस्तेमाल कर रहे हैं। आम्रपाली और चौसा के लिए पांच हजार नए बैग मंगवाये हैं। बाराबंकी, उन्नाव, बुलंदशहर और अमरोहा के हसनगंज के बागवान भी इस प्रणाली से आम को निर्यात लायकबनाने में जुटे हैं।
कितनी कारगर है बैगिंग
औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के मुख्य विशेषज्ञ कृष्ण मोहन चौधरी बताते हैं कि बैगिंग प्रणाली से फसल पर कीटों से बचाव होता है। फल को एक विशेष प्रकार के लिफाफे या बैग से ढक दिया जाता है। दशहरी के साथ चौंसा, लंगड़ा और अवध समृद्धि जैसी खास किस्मों को बचाने पर अधिक जोर दिया जाता है।
फल जब 40-50 दिन का हो तभी बैग बांधा जाता है। यह दोहरी परत वाले भूरे या अंदर से काले कागज का बनाया जाता है। हवादार और पानी प्रतिरोधी होते हैं, जिससे फल को आसानी से सांस मिलती है। जिन बागों में फ्रूट फ्लाई मक्खी, स्पॉरेड बग और एंथ्रेक्नोज व अन्य फंगस लगते हैं वहां इसका सर्वाधिक पायदा मिलता है।
एक किलो आम पर 15 रुपये का खर्च
विपिन मौर्य बताते हैं कि लखनऊ में कई कंपनियां बैग बना रही हैं। सामान्य बैग 1.75 रुपये और अच्छी गुणवत्ता वाला 1.90 रुपये में मिलता है। प्रति बैग 50 पैसे बांधने और 50 पैसे खोलने के लगते हैं। किलो में करीब पांच आम चढ़ते हैं। ऐसे में प्रति किलो 15 रुपये खर्च आता है। बांधने के बाद कीटनाशक नहीं छिड़कना पड़ता है। सामान्य से 15 रुपये प्रति किलो अधिक कीमत भी मिलती है।
संयुक्त निदेशक उद्यान विभाग डॉ. राजीव वर्मा ने बताया कि विभाग पहले आओ, पहले पाओ की तर्ज पर बैग पर अनुदान दे रहा है। प्रति हेक्टेयर 25 हजार रुपये और अधिकतम 50 हजार रुपये अनुदान है। आम के साथ ही अमरूद, केला पर भी मदद दी जाती है। इसके लिए विभाग के पोर्टल पर पंजीयन करना होता है। किसानों का चयन बजट के आधार पर किया जाता है।